History

मीणा समाज का इतिहास मीना जाति मुख्यतया भारत के राजस्थान की निवासी होकर अब राजस्थान; मध्य प्रदेश; महारास्ट; दिल्ली आदि राज्यों में निवास करने वाली एक जनजाति है। इन्हे वैदिक युग के मत्स्य गणराज्य के मत्स्य जनजाति का वंशज कहा जाता है, जो कि छठी शताब्दी बी॰सी॰ मे पल्लवित हुये। [1] मीणा भारत कि भील अनुसूचित जन जाति वर्ग से संबन्धित है ! [2] परंतु मध्य प्रदेश मे मीणा (क्रम -३२) विदिशा जिले कि सिरोंज व लटैरी तहसील मे अनुसूचित जन जाति मे सम्मिलित थी जिसे शडयंत्र पूर्वक बगेर राज्य सरकार की अनुशंसा के दिनांक ८/१/२००३ को हटा दिया है जबकि शेष मध्य प्रदेश मे मीना अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत क्रमांक २१ पर आते है। [3] म प्र के मीना आदिवासी की सूचि मे शामिल होने के लिये प्रयासरत हें इसके लिये 6/10/1996; 4/2/2001 को राजधानी भोपाल मे प्रांतीय सम्मेलन व दिनांक 26/6/2003; 17/1/2007 प्रांतीय प्रतिनिधि सम्मेलन किये तथा दिनांक 7/11/2011 को प्रथम प्रांतीय महिला सम्मेलन आयोजित किया गया! दिनांक 10/10/2015 को भोपाल मे श्री लालाराम मीना (पूर्व न्यायाधीश) प्रदेशाध्यक्ष म प्र मीना समाज सेवा संगठन के नेत्रित्व मे विशाल प्रतिनिधि सम्मेलन कर मुख्यमंत्री म प्र शासन से मांग करने पर मुख्यमंत्री द्वारा संपूर्ण प्रदेश मे मीना जाति को जनजाति की सूचि मे शामिल कराने की अनुशंसा भेजने व मीना कर्मचारियो के विरु्द्व की जा रही कार्यवाही रोकने व शासन मे मीनाओ को प्रतिनिधित्व देने का आसवासन तो दिया हे। म प्र मीना समाज सेवा संगठन द्वारा सुर्प्रीम कोर्ट से भी 8/10/2015 को अपने पक्ष मे कुछ सहायता प्राप्त की हे! [4] । वेद पुराणों के अनुसार मीणा जाति मत्स्य(मीन) भगवान की वंशज है। पुराणों के अनुसार चैत्र शुक्ला तृतीया को कृतमाला नदी के जल से मत्स्य भगवान प्रकट हुए थे। इस दिन को मीणा समाज में जहाँ एक ओर मत्स्य जयन्ती के रूप में मनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर इसी दिन संम्पूर्ण राजस्थान सहित अन्य प्रदेशो में गणगौर का त्योहार बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। मीणा जाति का गणचिह्न मीन (मछली) था। मछली को संस्कृत में मत्स्य कहा जाता है। प्राचीनकाल में मीणा जाति के राजाओं के हाथ में वज्र तथा ध्वजाओं में मत्स्य का चिह्न अंकित होता था, इसी कारण से प्राचीनकाल में मीणा जाति को मत्स्य माना गया। प्राचीन ग्रंथों में मत्स्य जनपद का स्पष्ट उल्लेख है जिसकी राजधानी विराट नगर थी, जो अब जयपुर वैराठ है। इस मस्त्य जनपद में अलवर,भरतपुर एवं जयपुर के आस-पास का क्षेत्र शामिल था। आज भी मीणा लोग इसी क्षेत्र में अधिक संख्या में रहते हैं। मीणा जाति के भाटों (जागा) के अनुसार मीणा जाति में 12 पाल, 32 तड़ एवं 5248 गौत्र हैं। मध्य प्रदेश के भी लगभग 26 ज़िलों मे मीणा समाज के 35 लाख लोग निवास करते है। मूलतः मीना एक सत्ताधारी जाति थे और मत्स्य, यानी राजस्थान या मत्स्य संघ के शासक थे, लेकिन मीना राज्यों का पतन सडयंत्रो के साथ आत्मघात से शुरू हुआ ! ब्रिटिश सरकार ने मीनाओ को "आपराधिक जाति" मे डाल दिया था। मीणा जाति प्रमुख रूप से निम्न वर्गों में बंटी हुई है:- 1. जमींदार या पुरानावासी मीणा : जमींदार या पुरानावासी मीणा वे हैं जो प्रायः खेती एवं पशुपालन का कार्य वर्षों से करते आ रहे हैं। ये लोग राजस्थान के सवाई माधोपुर, करौली, दौसा व जयपुर जिले में सर्वाधिक हैं| 2. नयाबासी मीणा : नयाबासी मीणा वे मीणा हैं जो अपनी स्वछंद प्रकृति का कार्य करते थे। इनके पास जमींनें नहीं थीं, इस कारण जहाँ इच्छा हुई वहीं बस गए। उक्त कारणों से इन्हें नयाबासी भी कहा जाता है। ये लोग सीकर, झुंझुनू, एवं जयपुर जिले में सर्वाधिक संख्या में हैं। 3. प्रतिहार या पडिहार मीणा : इस वर्ग के मीणा टोंक, भीलवाड़ा, तथा बूंदी जिले में बहुतायत में पाये जाते हैं। प्रतिहार का शाब्दिक अर्थ उलट का प्रहार करना होता है। ये लोग छापामार युद्ध कौशल में चतुर थे इसलिये प्रतिहार कहलाये। 4. रावत मीणा : रावत मीणा अजमेर, उदयपुर, चित्तोड़गढ़, मारवाड़ में निवास करते हैं। 5. मीणा : ये लोग सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं चित्तोड़गढ़ जिले में प्रमुख रूप से निवास करते हैं।म प्र के 26 जिलो मे मीना; रावत; मैना; मारन आदि नामो से ३५ लाख मीना निवास करते हें! मीनाओ के प्रमुख राज्य निम्नलिखित थे:- 1. खोहगंग का चांदा राजवंश 2. मांच का सीहरा राजवंश 3. गैटोर तथा झोटवाड़ा के नाढला राजवंश 4. आमेर का सूसावत राजवंश 5. नायला का राव बखो [beeko] देवड़वाल [द॓रवाल] राजवंश 6. नहाण का गोमलाडू राजवंश 7. रणथम्भौर का टाटू राजवंश 8. नाढ़ला का राजवंश 9. बूंदी का ऊसारा राजवंश 10. मेवाड़ का मीणा राजवंश 11. माथासुला ओर नरेठका ब्याड्वाल 12. झान्कड़ी अंगारी (थानागाजी) का सौगन मीना राजवंश 13. भानगढ़ का जाखीवाल राजवंश प्रचीनकाल में मीणा जाति का राज्य राजस्थान में चारों ओर फ़ैला हुआ था। मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख किले 1. आमागढ़ का किला 2. हथरोई का किला 3. खोह का किला 4. जमवारामगढ़ का किला मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख बाबड़ियां 1. भुली बाबड़ी ग्राम सरजोली 2. मीन भग्वान बावदी, सरिस्का, अलवर 3. पन्ना मीणा की बाबड़ी, आमेर 4. खोहगंग की बाबड़ी, जयपुर मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख मंदिर 1. दांत माता मंदिर, जमवारामगढ़- सीहरा मीणाओं की कुल देवी 2. शिवमंदिर, मीन भगवान मंदिर नई का नाथ,(बांसखो) जयपुर 3. मीन भगवान मन्दिर्, बस्सी, जयपुर् 4. बांकी माता का मंदिर, टोडा का महादेव, सेवड माता -ब्याडवाल मीणाओं का 5. बाई का मंदिर, बड़ी चौपड़, जयपुर 6. मीन भगवान का मंदिर, मलारना चौड़, सवाई माधोपुर (राजस्थान) 7. मीन भगवान का भव्य मंदिर , चौथ का बरवाड़ा , सवाई माधोपुर (राजस्थान) 8. मीन भगवान का मंदिर, खुर्रा, लालसोट, दौसा (राजस्थान) 9. दांतमाता मंदिर (राम्यावाला) जमवारामगढ़, जयपुर। मध्ययुगीन इतिहास प्राचीन समय मे मीणा राजा आलन सिंह ने एक असहाय राजपूत माँ और उसके बच्चे को उसके दायरे में शरण दी थी। बाद में, मीणा राजा ने उस बच्चे ढोलाराय को दिल्ली मीणा राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा था। राजपूतो ने इस एेहसान के लिए आभार मे सणयन्त्रकारिओ के साथ मिलकर आये और दीवाली पर निहत्थे मीनाओ पर धोके से जब वह पित्रो को निहत्ते होकर तर्पन कर रहे थे तब आक्रमण कर दिया । "[Tod.II.281] और इस प्रकार कछवाहा राजपूतों ने सडयंत्र पूर्वक खोगओन्ग पर विजय प्राप्त की थी, यह राजस्थान के इतिहास में शर्मनाक व सबसे कायर हरकत मानी जाति हे। एम्बर के कछवाहा राजपूत शासक भारमल हमेशा नह्न मीना राज्य पर हमला करता था, लेकिन बहादुर बड़ा मीणा के खिलाफ सफल नहीं हो सका। अकबर ने राव बड़ा मीना को कहा था, अपनी बेटी कि शादी उससे करने के लिए लेकिन उसने अपनी वेटी की शादी अकबर के साथ नही की थी। बाद में कायर धोकेबाज भारमल ने अपनी बेटी जोधा की शादी अकबर से कर दि। तब अकबर और भारमल की संयुक्त सेना ने बड़ा हमला किया और मीना राज्य को नस्ट कर दिया। मीनाओ का खजाना अकबर और भारमल के बीच साझा किया गया था। भारमल ने एम्बर के पास जयगढ़ किले में खजाना रखा!

मीणा जनजाति, राजस्थान 2 Shares facebook sharing button Sharemessenger sharing button Sharetwitter sharing buttonemail sharing buttonwhatsapp sharing buttonsharethis sharing button First Published: September 28, 2019 | Last Updated:September 26, 2020 मीणा मुख्य रूप से राजस्थान राज्य में पाया जाने वाला एक समुदाय है। इस समुदाय का नाम मीन शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है संस्कृत भाषा में मछली। ब्रिटिश शासन के समय, मीणा आदिवासी समुदाय को ‘आपराधिक जनजाति’ कहा गया था। राजस्थान में राजपूत साम्राज्य के साथ अपना गठबंधन बनाए रखने के लिए यह कृत्य किया गया था, इस तथ्य को भी प्रकट करता है कि ये मीणा जनजाति अभी भी राजपूतों के साथ युद्ध में थीं, अपने खोए हुए राज्यों को पाने के लिए छापामार हमलों में लिप्त थीं। मीणा मुख्य रूप से राजस्थान के उत्तरी भाग में रहते हैं, जिनमें सवाई माधोपुर जिला, दौसा जिला, जयपुर, धौलपुर और करौली जिले जैसे जयपुर और भरतपुर क्षेत्र शामिल हैं। वे भरतपुर जिले और बयाना जिले और शेखावटी क्षेत्र में जयपुर-सीकर और राज्य के उत्तर-पूर्व क्षेत्र अलवर में भी रहते हैं। इस समुदाय के लोग मध्य प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी भागों सहित कोटा, झालावाड़ और बूंदी में भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। मीणा जनजाति की उत्पत्ति मीणा मौखिक इतिहास में कई मिथकों और किंवदंतियों के माध्यम से अपनी उत्पत्ति की कहानी बताते हैं। पौराणिक कथाएं मीना जनजाति की उत्पत्ति मत्स्य अवतार या भगवान विष्णु के दसवें अवतार से बताती हैं। राजस्थान में संख्यात्मक रूप से मीना सबसे बड़ी जनजाति है। वे एक बार जयपुर और अलवर के पूर्व राज्यों पर शासन करते थे और अनिवार्य रूप से एक कृषि समुदाय थे। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, मीणा समुदाय के लोग “चैत्र शुक्ल पक्ष” के तीसरे तीथ पर विष्णु के नाम पर मीनेश जयंती मनाते हैं। यह विश्वास मुख्य रूप से मत्स्य पुराण के ग्रंथ पर आधारित है। मीणा जनजाति का इतिहास प्राचीन भारतीय ग्रंथ ऋग्वेद में दर्शाया गया है कि मीणाओं के राज्य को संस्कृत में मत्स्य साम्राज्य कहा जाता था। राजस्थान के मीणा जनजाति के लोग आज तक भगवान शिव, भगवान हनुमान और भगवान कृष्ण के साथ-साथ देवी (देवी) की पूजा करते रहे हैं। मीणा आदिवासी समुदाय भील जनजाति के समुदाय सहित अन्य जनजातियों के साथ समाज में अपना स्थान साझा करता है। वास्तव में ये मीणा जनजाति अन्य जनजातीय समुदायों के सदस्यों के साथ बहुत अच्छे संबंध साझा करती हैं। मीणा लोग वैदिक संस्कृति के अनुयायी हैं और यह भी उल्लेख किया गया है कि मीणा समूहों में भारमान और सिथियन पूर्वज थे। आक्रमण के वर्षों के दौरान, 1868 में मीणाओ के कई नए समूहों का गठन किया गया है, जो कि अकाल के तनाव के कारण राजपुताना को उजाड़ दिया। राजस्थान के इतिहास में मीणाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे पहले, राजपूत और मीणा प्रमुखों ने दिल्ली के तोर राजाओं के अधीन रहते हुए देश के एक बड़े हिस्से पर शासन किया। मीणा समुदाय को मुख्य रूप से चार बुनियादी क्षेत्रों में जमींदार मीणा, चौकीदार मीणा, परिहार मीणा और भील मीणा में रखा गया था। पूर्व में मिनस देश के विभिन्न संप्रदायों में बिखरे हुए थे और आसपास के क्षेत्र में बदलाव के कारण उनके चरित्र अलग-अलग हैं। करौली, सवाई माधोपुर, जयपुर, गंगापुर क्षेत्र के मिनस पिछले चार सौ वर्षों के लिए सबसे महत्वपूर्ण काश्तकार हैं। कई गाँवों से धनगर और लोधियों को मिनास द्वारा बाहर निकाला गया और उनके कब्जे को फिर से स्थापित करने में कामयाबी मिली। मीणा जनजाति की संस्कृति कहा जाता है कि मेओ जनसंख्या की उत्पत्ति मीणाओं से हुई थी और इस कारण से मीणाओं की नैतिकता और संस्कृति में समानता है। राजपूतों को मीणाओं, गुर्जर समुदाय, जाट और अन्य योद्धा जनजातियों का प्रवेश माना जाता है। त्यौहार, संगीत, गीत और नृत्य इस बात का प्रमाण हैं कि इन मीणा जनजातियों की संस्कृति और परंपरा काफी उज्ज्वल है। यद्यपि मीना जनजाति इन त्योहारों को प्राप्त करती हैं, लेकिन उन्होंने स्थानीय मूल के अपने अनुष्ठानों और संस्कारों को शामिल किया है। उदाहरण के लिए, नवरात्रि का सातवां दिन मीना जनजातियों के लिए उत्सव का समय है, जो कलाबाजी, तलवारबाजी और नाच-गाने के साथ आनन्दित होते हैं। मिनस दृढ़ता से विवाह की संस्था में विश्वास करते हैं। यह भोपा पुजारी हैं जो कुंडली के आधार पर मंगनी में शामिल होते हैं। इस राजस्थानी आदिवासी समुदाय में इस तरह के महान उत्सव के लिए बुलाते हैं। त्यौहारों की अधिकता मीना जनजातियों द्वारा भी मनाई जाती है। इस तथ्य की पुष्टि भगवान विष्णु के नाम पर मीनेश जयंती को प्राप्त करने की सैकड़ों प्राचीन संस्कृति से होती है। वे अपने समुदाय में जन्म, विवाह और मृत्यु से संबंधित सभी अनुष्ठानों को करने के लिए एक ब्राह्मण पुजारी को नियुक्त करते हैं। अधिकांश मिनास हिंदू धर्म का पालन करते हैं। मीणा जनजाति की वेशभूषा मीणा समुदाय के लोगों के कपड़े अन्य जनजातीय लोगों से काफी मिलते-जुलते हैं, मुख्यतः महिलाओं के कपड़े डिजाइन में सूक्ष्म अंतर के साथ शैली में बहुत समान हैं। एक मीना महिला की पोशाक में ओधना, घाघरा, कांचली और कुर्ती शामिल होती है। अविवाहित मीणा लड़कियां लुगडा नामक एक साड़ी पहनती हैं। दबी-वली लुडी एक विशेष ओधना है जो मीना महिलाओं द्वारा पहना जाता है और हमेशा लाल और हरे रंग का होता है। टखने की लंबाई वाला घाघरा, जो आमतौर पर नीले रंग के डिजाइन के साथ गहरे लाल रंग के कपड़े से बना होता है, एक मीणा महिला की पहचान करने के लिए एक विशिष्ट चिह्न है। मीणा महिलाएं गहने के साथ खुद को सजाना पसंद करती हैं। मीना महिलाओं का सबसे प्रमुख आभूषण `बोरला` है, जो उनकी वैवाहिक स्थिति का प्रतीक है। महिलाएं `हांसली` को गले में पहनती हैं, नाक में `नाथ`, कानों में `टिमनीया`,` पैंची’,`चूड़ी`,`गजरा` और हाथों में चूड़ियाँ और ऊपरी बाजुओं में `बाजूबंद` पहनती हैं। । सभी विवाहित महिलाएँ हमेशा लाख की बनी `चूड़ा` पहनती हैं। वे अपने पैरों पर `कडी` और` पाजेब` भी पहनते हैं। चांदी का उपयोग सिर और गर्दन के आभूषणों के लिए किया जाता है, जबकि पैरों के गहने पीतल से तैयार किए जाते हैं। मीणा महिलाएं आमतौर पर सोना नहीं पहनती हैं। वैवाहिक स्थिति के बावजूद, एक मीना महिला अपने बालों को ढीला नहीं करती है। बाल करना उनकी नियमित जीवन शैली का एक हिस्सा है। यह आमतौर पर माथे के बीच में होता है, जिसे `बोरला` के साथ बंद किया जाता है, जो विवाहित महिलाओं के मामले में नकली पत्थरों से जड़ी होती है। अविवाहित लड़कियां अपने बालों को एक ही ब्रैड में पहनती हैं, जो एक गाँठ में समाप्त होता है। मीणा व्यक्ति की पोशाक में धोती, कुर्ता या बंदगी और पगड़ी होती है, हालांकि युवा पीढ़ी ने शर्ट को पजामा या पतलून के साथ अपनाया है। सर्दियों के दौरान, मीणा पुरुष एक शॉल पहनते हैं जो उनके शरीर के ऊपरी हिस्से को कवर करता है। उनकी सामान्य हेडड्रेस पोटिया है, जिसे सजावटी टेप के साथ चारों ओर लपेटा जाता है। गोटा वर्क वाला रेड-प्रिंटेड हेडगियर भी पहना जाता है। एक शाल, जिसे गले में पहना जाता है, वह भी लाल और हरे रंग में होता है। दिलचस्प बात यह है कि शादी से मीणा व्यक्ति की वेशभूषा में बदलाव आता है। शादी के समय एक लंबा लाल रंग का ऊपरी वस्त्र पहना जाता है। यह बछड़ा-लंबाई वाला और सीधा है, जिसके किनारे लंबे हैं और पूरी आस्तीन के हैं। वे सामान्य रूप से धोती को निचले वस्त्र के रूप में पहनते हैं, जो कि टखनों के ठीक नीचे होता है। यह कड़ा पहना जाता है और `डॉलांगी` या` तिलंगी` धोती की तरह लिपटा होता है। मीना पुरुष ज्यादा आभूषण नहीं पहनते हैं। सबसे आम गहने कान के छल्ले होते हैं जिन्हें `मुर्की` कहा जाता है। शादी के समय अन्य सामान में एक बड़ी तलवार और कलाई पर एक `कड़ा` शामिल होता है। पुरुष अपने बालों को छोटा और आमतौर पर, खेल दाढ़ी और छोटी मूंछें पहनते हैं। मीणा समुदाय के साथ टैटू भी लोकप्रिय हैं। मीना महिलाएं अपने हाथों और चेहरे पर टैटू प्रदर्शित करती हैं। सबसे आम डिजाइन डॉट्स, फूल या उनके स्वयं के नाम हैं। वे अपनी आँखों में कोहल पहनते हैं और शरीर के अलंकरण के रूप में चेहरे पर काले डॉट्स। गोदना पुरुषों के साथ ही लोकप्रिय है और उनके नाम, पुष्प रूपांकनों, आकृतियों और देवताओं के साथ आमतौर पर उनके अग्रभाग हैं। मीना जनजातियों द्वारा बोली जाने वाली मुख्य भाषाओं में हिंदी भाषा, मेवाड़ी, मारवाड़ी भाषा, धुंदरी, हरौटी, मालवी भाषा, गढ़वाली भाषा, भीली भाषा, आदि शामिल हैं।

मीणा समाज को राजस्थान में आरक्षण कैसे मिला देश के आजाद होते ही हमारे नेताओं ने मन्थन किया कि स्वतंत्र भारत का शासन और प्रशासन कैसा हो और तय किया कि जनतंत्र के लिये आवश्यक है कि विभिन्न वर्गों में व्याप्त सामाजिक व आर्थिक असमानता को दूर किया जाये तथा सदियों से दलित,शोषित व पिछडे वर्गों को आगे लाकर उनको देश के चलाने में बराबर के भागीदार बनाया जाये। इसी विचार ने शासन और प्रशासन में आरक्षण की व्यवस्था को जन्म दिया।मीणा-समाज भी सदियों से शोषित रहा है और जनजाति-वर्ग का रहा है जिसका जिक्र पिछले सवासो वर्षों से भी ज्यादा पुराने सरकारी दस्तावेजों तथा इतिहास की किताबों में है। लेकिन 26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ और आरक्षण की सूचियां निकलीं तो मीणा-समाज का नाम जनजाति वर्ग की सूची से गायब था। मीणा-समाज में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई और 1950 में ही जयपुर में गांधी जयंती के दिन राजस्थान आदिवासी मीणा महापंचायत के तत्वाधान में एक विशाल मीणा-सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में सर्वसम्मति से निश्चय किया कि विगत वर्षों की जनगणना रिपोर्टों ऐतिहासिक दस्तावेजों एवं पुस्तकों तथा राजकीय अभिलेखों के आधार पर यह सिद्ध किया जाए कि मीणा जाति राजस्थान की मूल आदिवासी जाति है और इसे अनुसूचित जनजातियों की सूची में सम्मिलित न किया जाना इसके साथ घोर अन्याय है। इसके लिये एक ज्ञापन तैयार करने का दायित्व महापंचायत के अध्यक्ष श्री गोविन्दराम मीणा को सौंपा गया। 1 नवम्बर,1950 को महापंचायत के एक प्रतिनिधि मंडल ने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू,गृहमंत्री एवं प्रमुख संसद सदस्यों को ज्ञापन दिया। प्रतिनिधि मंडल में अध्यक्ष श्री गोविन्दराम मीणा के अतिरिक्त शाहजहांपुर(अलवर) के सूबेदार सांवत सिंह,कोटपुतली(जयपुर) के रामचन्द्र जागीरदार,जयपुर शहर के किशनलाल वर्मा,कोटपुतली(जयपुर) के अरिसाल सिंह मत्स्य व अलवर के बोदनराम थे। इस प्रतिनिधि-मंडल ने तीन सप्ताह दिल्ली में रहकर मंत्रियों व सांसदों को अनुसूचित जनजातियों में मीणों को न रखे जाने पर तीव्र असंतोष व्यक्त किया। गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने ज्ञापन को बडी बारीकी से पढा और आधे घण्टे तक प्रतिनिधि-मंडल की बात सुनी। यह आश्वासन भी दिया कि राजस्थान सरकार की गलती से यह भूल हुई है और जब भी कभी अनुसूचित जनजातियों की सूची में संशोधन किया जायेगा,मीणा जाति को भी इसमें शामिल कर लिया जायेगा। प्रतिनिधि मंडल ने फ़िर भी ढिलाई नहीं बरती और सांसदों पर दबाब बनाये रखा जिस पर जोधपुर (राजस्थान) के लोकनायक जयनारायण व्यास जो उस समय सांसद थे,ने इस मांग का पुरजोर समर्थन करते हुए लोकसभा में एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव पर बहस हुई और अनेक सांसदों ने जिसमें मध्य प्रदेश के सांसद हरिविष्णु कामथ थे,मीणों के पक्ष में जोरदार पैरवी की। इसका परिणाम यह हुआ कि गृहमंत्री ने बहस का जबाब देते हुऐ बताया कि भारत सरकार इसके लिये एक आयोग गठित करेगी। साथ ही भारत सरकार ने राजस्थान सरकार की टिप्पणी मांगी तो राजस्थान सरकार ने 1951 की मई में केवल उदयपुर,डूंगरपुर,बांसवाडा,पाली और जालौर जिलों के मीणों को ही अनुसूचित जनजाति मानने की सिफ़ारिश की। राजस्थान आदिवासी मीणा महापंचायत ने भारत सरकार से घोर प्रतिरोध किया और मांग की कि सारे राजस्थान की मीणा जाति को अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित किया जाये। इसी बीच भारत सरकार ने 1953 में काका कालेलकर आयोग की नियुक्ति की घोषणा की। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर भारत सरकार ने अनुसूचित जनजाति(संशोधन) विधेयक 1956 लोकसभा में पेश किया जिसमें अन्य जातियों के साथ-साथ राजस्थान की मीणा जाति का नाम भी जनजाति की सूची में रखा गया। संसद ने इस विधेयक को यथावत पास कर दिया जिसको भारत के राष्ट्रपति ने 25/09/1956 को स्वीकृति दे दी। इस तरह राजस्थान के मीणों को जनजाति वर्ग का आरक्षण मिला। जिस ज्ञापन के आधार पर राजस्थान के मीणों को जनजाति वर्ग में शामिल किया गया,उसमें वर्णित दस्तावेजों में मीणा जाति को एबओरीजनल एवं प्रिमिटिव ट्राइब बताया गया वे निम्नानुसार हैं:- 1. जनगणना रिपोर्ट 1871,वोल्यूम दो पेज-48(मारवाड दरबार के आदेश से प्रकाशित) 2. जनगणना रिपोर्ट 1901, वोल्यूम 25, पेज-158 3. जनगणना रिपोर्ट 1941, पेज-41 4. इम्पीरियल गजेटियर ऑफ़ इन्डिया प्रोविन्सीयल सीरीज राजपूताना(पेज-38) 5. इम्पीरियल गजेटियर वोल्यूम प्रथम(द्वारा सी सी वाटसन) पेज-223 6. एनाल्स एण्ड एन्टीक्वीटीज ऑफ़ राजपूतना सेन्ट्रल एण्ड वेस्टन राजपूत ऐस्टेट ऑफ़ इण्डिया-लेखक कर्नल जेम्स टॉड 7. "जाति भासकर" लेखक विद्याभारती पं.ज्वाला प्रसाद मिश्र(पेज-101) 8. "मूल भारतवासी और आर्य" लेखक श्री स्वामी वेधानन्द महारिथर 9. "राजपूताने का इतिहास" लेखक पं. गौरीशंकर हीरा चन्द ओझा 10. "उदयपुर राज्य का इतिहास" (पेज-316) लेखक पं.गौरीशंकर हीरा चन्द ओझा 12. "मीन पुराण भूमिका" लेखक मुनि मगन सागर जी प्रस्तुतकर्ता Rajesh Kumar Meena (Dhansal)पर 12:52 am 18 टिप्‍पणियां: Rajesh Kumar Meena (Dhansal) ने कहा… जय मीनेष भगवान् मीनेष की इच्छा से इस वेबपोर्टल का निर्माण हुआ. समाज के होनहार युवक जो आईटी के क्षेत्र से जुडा हैं ने इसका निर्माण किया है. वेबसाइट का मुख्‍य उद़देश्‍य है समाज के विचारों का आदान प्रदान करना पूरे विश्‍व स्‍तर पर। साथ ही शिक्षा के मामले भी समाज आगे आए यह हमारा प्रमुख लक्ष्‍य हैं। लेकिन इसके लिए आपके सुझाव अति आवश्‍यक है। इसी से यह वेबसाइट मजबूत होगी। 6 मार्च 2010 को 2:06 am Rajesh Kumar Meena (Dhansal) ने कहा… मीणा समाज को राजस्थान में आरक्षण कैसे मिला देश के आजाद होते ही हमारे नेताओं ने मन्थन किया कि स्वतंत्र भारत का शासन और प्रशासन कैसा हो और तय किया कि जनतंत्र के लिये आवश्यक है कि विभिन्न वर्गों में व्याप्त सामाजिक व आर्थिक असमानता को दूर किया जाये तथा सदियों से दलित,शोषित व पिछडे वर्गों को आगे लाकर उनको देश के चलाने में बराबर के भागीदार बनाया जाये। इसी विचार ने शासन और प्रशासन में आरक्षण की व्यवस्था को जन्म दिया।मीणा-समाज भी सदियों से शोषित रहा है और जनजाति-वर्ग का रहा है जिसका जिक्र पिछले सवासो वर्षों से भी ज्यादा पुराने सरकारी दस्तावेजों तथा इतिहास की किताबों में है। लेकिन 26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ और आरक्षण की सूचियां निकलीं तो मीणा-समाज का नाम जनजाति वर्ग की सूची से गायब था। मीणा-समाज में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई और 1950 में ही जयपुर में गांधी जयंती के दिन राजस्थान आदिवासी मीणा महापंचायत के तत्वाधान में एक विशाल मीणा-सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में सर्वसम्मति से निश्चय किया कि विगत वर्षों की जनगणना रिपोर्टों ऐतिहासिक दस्तावेजों एवं पुस्तकों तथा राजकीय अभिलेखों के आधार पर यह सिद्ध किया जाए कि मीणा जाति राजस्थान की मूल आदिवासी जाति है और इसे अनुसूचित जनजातियों की सूची में सम्मिलित न किया जाना इसके साथ घोर अन्याय है। इसके लिये एक ज्ञापन तैयार करने का दायित्व महापंचायत के अध्यक्ष श्री गोविन्दराम मीणा को सौंपा गया। 1 नवम्बर,1950 को महापंचायत के एक प्रतिनिधि मंडल ने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू,गृहमंत्री एवं प्रमुख संसद सदस्यों को ज्ञापन दिया। प्रतिनिधि मंडल में अध्यक्ष श्री गोविन्दराम मीणा के अतिरिक्त शाहजहांपुर(अलवर) के सूबेदार सांवत सिंह,कोटपुतली(जयपुर) के रामचन्द्र जागीरदार,जयपुर शहर के किशनलाल वर्मा,कोटपुतली(जयपुर) के अरिसाल सिंह मत्स्य व अलवर के बोदनराम थे। इस प्रतिनिधि-मंडल ने तीन सप्ताह दिल्ली में रहकर मंत्रियों व सांसदों को अनुसूचित जनजातियों में मीणों को न रखे जाने पर तीव्र असंतोष व्यक्त किया। गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने ज्ञापन को बडी बारीकी से पढा और आधे घण्टे तक प्रतिनिधि-मंडल की बात सुनी। यह आश्वासन भी दिया कि राजस्थान सरकार की गलती से यह भूल हुई है और जब भी कभी अनुसूचित जनजातियों की सूची में संशोधन किया जायेगा,मीणा जाति को भी इसमें शामिल कर लिया जायेगा। प्रतिनिधि मंडल ने फ़िर भी ढिलाई नहीं बरती और सांसदों पर दबाब बनाये रखा जिस पर जोधपुर (राजस्थान) के लोकनायक जयनारायण व्यास जो उस समय सांसद थे,ने इस मांग का पुरजोर समर्थन करते हुए लोकसभा में एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव पर बहस हुई और अनेक सांसदों ने जिसमें मध्य प्रदेश के सांसद हरिविष्णु कामथ थे,मीणों के पक्ष में जोरदार पैरवी की। इसका परिणाम यह हुआ कि गृहमंत्री ने बहस का जबाब देते हुऐ बताया कि भारत सरकार इसके लिये एक आयोग गठित करेगी। साथ ही भारत सरकार ने राजस्थान सरकार की टिप्पणी मांगी तो राजस्थान सरकार ने 1951 की मई में केवल उदयपुर,डूंगरपुर,बांसवाडा,पाली और जालौर जिलों के मीणों को ही अनुसूचित जनजाति मानने की सिफ़ारिश की। राजस्थान आदिवासी मीणा महापंचायत ने भारत सरकार से घोर प्रतिरोध किया और मांग की कि सारे राजस्थान की मीणा जाति को अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित किया जाये। इसी बीच भारत सरकार ने 1953 में काका कालेलकर आयोग की नियुक्ति की घोषणा की। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर भारत सरकार ने अनुसूचित जनजाति(संशोधन) विधेयक 1956 लोकसभा में पेश किया जिसमें अन्य जातियों के साथ-साथ राजस्थान की मीणा जाति का नाम भी जनजाति की सूची में रखा गया। संसद ने इस विधेयक को यथावत पास कर दिया जिसको भारत के राष्ट्रपति ने 25/09/1956 को स्वीकृति दे दी। इस तरह राजस्थान के मीणों को जनजाति वर्ग का आरक्षण मिला। जिस ज्ञापन के आधार पर राजस्थान के मीणों को जनजाति वर्ग में शामिल किया गया,उसमें वर्णित दस्तावेजों में मीणा जाति को एबओरीजनल एवं प्रिमिटिव ट्राइब बताया गया वे निम्नानुसार हैं:- 6 मार्च 2010 को 2:14 am Rajesh Kumar Meena (Dhansal) ने कहा… महाकवि श्यामलदास ने लिखा है कि उदयपुर जिले के मेवल क्षेत्र में मीणों की उत्पत्ति हुई थी और ये अपनी बहादुरी के बल पर भीलवाड़ा जिले के जहाजपुर एवं माण्डलगढ़ क्षेत्र में बस गए। येलोग अपनी उत्पत्ति पृथ्वीराज चौहान से मानते हैं। ये अपने एक पूर्वज-माला जुझार का बहुत अधिक सम्मान करते हैं। मीणा सम्पूर्ण राजस्थान में फैले हुए हैं। इतिहास के अनुसार आमेर पर सुसावत मीणों का शासन था। यही बात बून्दी तथा देवरिया (प्रतापगढ़) रियासत के शासकों के बारे में कहा जा सकता है। अलवर जिले के गजेटियर के अनुसार जयपुर के एक बहुत बड़े भू-भाग में मीणों का शासन रहा है। मीणा ३२ गोत्रों और दो भागों में विभक्त हुआ करता था - १) जमींदार या कृषक मीणा २) चौकीदार अथवा शासक मीणा कृषक मीणा अच्छे कृषक समूह का नेतृत्व करता था। जबकि चौकीदार उच्च वर्ग के समूह से सम्बन्ध रखते थे। इसलिए ये कृषक मीणा समूह में जन्म लेने वाली लड़की से विवाह तो कर लेते हैं, परन्तु अपनी लड़की का विवाह कृषक मीणा समूह के लड़के से कभी नहीं करते थे। इतिहास इस बात का गवाह है कि चौकीदार वर्गीय मीणाओं ने कृषि का व्यवसाय शुरु किया, तब वे अपनी कुलीनता एवं हैसियत खो बैठे। इस प्रकार वे कृषक वर्गीय समूह मीणा समूह से जा मिले। चौकीदार मीणों के वीरता के कारनामें दक्षिण भारत तक प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि ये लोग किसी एक बहादुर के नेतृत्व में सुदूर दक्षिण में हैदराबाद तक जाते थे और वहाँ डकैती जाते थे और अप्रत्यक्ष रुप से ठगी करता थे। ठगी अथवा लूट के माल से ये अपने आस - पास के गाँवों के लोगों की सहायता करते थे। उसी वजह से लुटेरे होते हुए भी ये अपने समूह में काफी लोकप्रिय थे। बहुसंख्यक वर्ग अपने आस - पास के इलाकों में ही चोरी और डकैती का काम किया करते थे। लोग आतंकित होकर इनके समूह को अपना गाँव सौंप देते थे और इन्हें बहुत बड़ी रकम अनौपचारिक रुप से कर के रुप में दे देते थे। उनके दुस्साहसपूर्ण कार्यों से महाराजा विजयसिंह बहुत तंग हो गये और इनपर प्रतिबन्ध लागू कर दिया। अच्छे आचरण वाले लोग उन चौकीदार मीणीं के साथ विवाह एवं हुक्के पानी के संबंध से परहेज रखने लगे। उत्तर पूर्वी राजस्थान के मीणें स्वयं को दक्षिणी राजस्थान के मीणों से अलग मानते हैं। यह भावना खासकर प्रतापगढ़ का मीणों में देखने को मिलती है। वास्तविक स्थिति यह है कि उत्तर - पूर्वी राजस्थान के मीणा में भी देखने को मिलती है । रहन - सहन तथा आचार - संहिता तथा आचार - विचार की की दृष्टि से यह समाज की मुख्य धारा से जुड़ गया। विवाह सम्बन्ध एवं सामाजिक रिश्तों का इनका अपना अलग दायरा है 6 मार्च 2010 को 2:15 am Rajesh Kumar Meena (Dhansal) ने कहा… महाकवि श्यामलदास ने लिखा है कि उदयपुर जिले के मेवल क्षेत्र में मीणों की उत्पत्ति हुई थी और ये अपनी बहादुरी के बल पर भीलवाड़ा जिले के जहाजपुर एवं माण्डलगढ़ क्षेत्र में बस गए। येलोग अपनी उत्पत्ति पृथ्वीराज चौहान से मानते हैं। ये अपने एक पूर्वज-माला जुझार का बहुत अधिक सम्मान करते हैं। मीणा सम्पूर्ण राजस्थान में फैले हुए हैं। इतिहास के अनुसार आमेर पर सुसावत मीणों का शासन था। यही बात बून्दी तथा देवरिया (प्रतापगढ़) रियासत के शासकों के बारे में कहा जा सकता है। अलवर जिले के गजेटियर के अनुसार जयपुर के एक बहुत बड़े भू-भाग में मीणों का शासन रहा है। मीणा ३२ गोत्रों और दो भागों में विभक्त हुआ करता था - १) जमींदार या कृषक मीणा २) चौकीदार अथवा शासक मीणा कृषक मीणा अच्छे कृषक समूह का नेतृत्व करता था। जबकि चौकीदार उच्च वर्ग के समूह से सम्बन्ध रखते थे। इसलिए ये कृषक मीणा समूह में जन्म लेने वाली लड़की से विवाह तो कर लेते हैं, परन्तु अपनी लड़की का विवाह कृषक मीणा समूह के लड़के से कभी नहीं करते थे। इतिहास इस बात का गवाह है कि चौकीदार वर्गीय मीणाओं ने कृषि का व्यवसाय शुरु किया, तब वे अपनी कुलीनता एवं हैसियत खो बैठे। इस प्रकार वे कृषक वर्गीय समूह मीणा समूह से जा मिले। चौकीदार मीणों के वीरता के कारनामें दक्षिण भारत तक प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि ये लोग किसी एक बहादुर के नेतृत्व में सुदूर दक्षिण में हैदराबाद तक जाते थे और वहाँ डकैती जाते थे और अप्रत्यक्ष रुप से ठगी करता थे। ठगी अथवा लूट के माल से ये अपने आस - पास के गाँवों के लोगों की सहायता करते थे। उसी वजह से लुटेरे होते हुए भी ये अपने समूह में काफी लोकप्रिय थे। बहुसंख्यक वर्ग अपने आस - पास के इलाकों में ही चोरी और डकैती का काम किया करते थे। लोग आतंकित होकर इनके समूह को अपना गाँव सौंप देते थे और इन्हें बहुत बड़ी रकम अनौपचारिक रुप से कर के रुप में दे देते थे। उनके दुस्साहसपूर्ण कार्यों से महाराजा विजयसिंह बहुत तंग हो गये और इनपर प्रतिबन्ध लागू कर दिया। अच्छे आचरण वाले लोग उन चौकीदार मीणीं के साथ विवाह एवं हुक्के पानी के संबंध से परहेज रखने लगे। उत्तर पूर्वी राजस्थान के मीणें स्वयं को दक्षिणी राजस्थान के मीणों से अलग मानते हैं। यह भावना खासकर प्रतापगढ़ का मीणों में देखने को मिलती है। वास्तविक स्थिति यह है कि उत्तर - पूर्वी राजस्थान के मीणा में भी देखने को मिलती है । रहन - सहन तथा आचार - संहिता तथा आचार - विचार की की दृष्टि से यह समाज की मुख्य धारा से जुड़ गया। विवाह सम्बन्ध एवं सामाजिक रिश्तों का इनका अपना अलग दायरा है 6 मार्च 2010 को 2:15 am Rajesh Kumar Meena (Dhansal) ने कहा… इस प्राचीन मेले की अद्भुत कहानी है। सदियों पूर्व खो-नागोरियान मेला स्थान के इर्द गिर्द पहाडों में चान्दा मीणा नामक व्यक्ति का शासन था। एक दिन चान्दा मीणा अपने साथियों के साथ शिकार खेलने के लिए मेला स्थल के पास से गुजर रहा था कि उसे झाडियों में बेर खाती हुई एक महिला दिखाई पडी। चान्दा मीणा ने उस जंगल में पहले तो उस महिला को देखकर चौंका , फिर घोडे से नीचे उतरकर उससे परिचय किया तो उस महिला ने कहा कि मैं आकाश से पटकी आपकी बहन हूं , मेरी मदद करो। यह सुन चान्दा मीणा उसे कुछ कहता उससे पहले झाडियों में से एकनवजात शिशु की रोने की आवाज आई। जब चांदा मीणा ने झाडियों में जाकर देखा तो उसे बच्चे पर सांप कुंडली मारकर बैठा नजर आया। यह देख चांदा मीणा घबरा गया। इतने में ही उस महिला के आते ही सांप वहां से चला गया। इस चमत्कार से चांदा मीणा बहुत प्रभावित हुआ और उससे राखी बंधवाकर उसे अपने साथ घर ले गया। चांदा की शरण में आकर उस महिला ने आप बीती सुनाते हुए बताया कि वह राजपूत जाति से है तथा पहले किसी राज्य की महारानी थी। उस महिला की मर्मस्पर्शी दास्तान सुनकर चांदा मीणा ने उस बच्चे का नाम मले सिंह रख दिया और उसे बडे लाड प्यार से पाला। मले सिंह जवान होते ही घुडसवारी व अस्त्र-शस्त्र विद्या में पांरगत हो गया किन्तु वह लोगों को सताने लगा। उसने उसे सुधारने और सबक देने के लिए एक दिन उसे कंकर भरे बोरों को गधे पर लादकर मलेसिंह को कहा कि इन सोने चांदी भरे बोरों को दिल्ली दरबार में नजराना कर आओ। यह नजराना हर वर्ष दिल्ली राजा को देने की परम्परा रही थी। उसी रूप में मले सिंह ने चांदा मीणा का आदेश पाकर दिल्ली रवाना हुआ। रास्ते में उत्सुकतावश उसने बोरों को देखने के लिए खलकाणी (कल्याणी पूर्व नाम) माता के मंदिर में बैठकर उन बोरों को खोला तो उनमें कंकर थे। मले सिंह ने माता को पुकारा। थोडी देर बाद मलेसिंह ने खलकाणी माता के भरोसे साहस बटोर कर दिल्ली की ओर कूच किया। जब दिल्ली जाकर उन बोरों को नजराना स्वरुप भेंट किया तो राजा ने देखा कि उसमें सोना-चांदी , हीरे , जवाहरात भरे है। राजा यह देखकर प्रसन्न हुआ और राजा ने मले सिंह को इनाम दिया। मले सिंह दिल्ली से लौटते वक्त ही सोच लिया था कि इसका बदला वह चांदा मीणा से अवश्य लेगा। किन्तु उसने यह भी सोचा कि हर समय अस्त्र-शस्त्र धारण करने के बाद चांदा मीणा से बदला लेना कठिन कार्य है। काफी खोजबीन करने के बाद मलेसिंह को पता चला की मीणा लोग वर्ष में एक बार अपने पूर्वजों को याद करने के लिए खलकाणी माता के बडली के तालाब में अस्त्र-शस्त्र उतार कर उनको जल देते है। मलेसिंह उस दिन का इंतजार करने लगा। दीपावली के दिन जब चांदा मीणा अपने साथियों को लेकर अपने पूर्वजों को पानी देने आया तो मलेसिंह उनके हथियार डालने का इंतजार कर रहा था। जैसे ही उन्होंने हथियार डाले मले सिंह ने निहत्थे चांदा मीणा पर बाणों से वार कर उसे मौत के घाट उतार दिया। उस दिन से मलेसिंह खलकाणी माता का भक्त बनकर श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करने लगा और वर्ष में एक बार मेला लगाने लगा।

RAJSTHAN Picture Picture Picture मीणा मुख्यत: भारत के राजस्थान राज्य में निवास करने वाली एक जाति है। मीणा का शाब्दिक अर्थ ‘मछली’ है। मीणा ‘मीन’ धातु से बना है। सबसे अधिक मीणा जाति के लोग जयपुर (सर्वाधिक), सवाई माधोपुर, उदयपुर,चुरू, आदि ज़िलों में निवास करते हैं। मीणा पुराण – रचियता –आचार्य मुनि मगन सागर लोक देवी – जीणमाता (रैवासा, सीकर) नाता प्रथा – इस प्रथा में स्त्री अपने पति, बच्चों को छोड़कर दूसरे पुरष से विवाह कर लेती है। वर्ग मीणा जनजाति के मुख्यत: दो वर्ग है - प्रथम वर्ग ज़मीदारों का है तथा द्वितीय वर्ग चौकीदारों का है। मीणा जनजाति 24 खापों में विभाजित है। मीणा जनजाति के बहिभाट को 'जागा' कहा जाता है। विशेषता मीणा जनजाति में संयुक्त परिवार प्रणाली पाई जाती है। ये लोग मांसाहारी होते है। विवाह - ब्रह्मा विवाह, गांधर्व विवाह होते हैं। ये लोग दुर्गा माता और शिवजी की पूजा करते हैं। HISTORY मीणा अथवा मीना मुख्यतया भारत के राजस्थान राज्य में निवास करने वाली एक जनजाति है। वेद पुराणों के अनुसार मीणा जाति मत्स्य(मीन) भगवान की वंशज है। पुराणों के अनुसार चैत्र शुक्ला तृतीया को कृतमाला नदी के जल से मत्स्य भगवान प्रकट हुए थे। इस दिन को मीणा समाज में जहाँ एक ओर मत्स्य जयन्ती के रूप में मनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर इसी दिन संम्पूर्ण राजस्थान में गणगौर का त्योहार बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। मीणा जाति का गणचिह्न मीन (मछली) था। मछली को संस्कृत में मत्स्य कहा जाता है। प्राचीनकाल में मीणा जाति के राजाओं के हाथ में वज्र तथा ध्वजाओं में मत्स्य का चिह्न अंकित होता था, इसी कारण से प्राचीनकाल में मीणा जाति को मत्स्य माना गया। प्राचीन ग्रंथों में मत्स्य जनपद का स्पष्ट उल्लेख है जिसकी राजधानी विराट नगर थी, जो अब जयपुर वैराठ है। इस मस्त्य जनपद में अलवर,भरतपुर एवं जयपुर के आस-पास का क्षेत्र शामिल था। आज भी मीणा लोग इसी क्षेत्र में अधिक संख्या में रहते हैं। मीणा जाति के भाटों (जागा) के अनुसार मीणा जाति में 12 पाल, 32 तड़ एवं 5248 गौत्र हैं। मध्य प्रदेश के भी लगभग 23 ज़िलों मे मीणा समाज निवास करता है। मूलतः मीना एक सत्ताधारी जाति थे और मत्स्य, यानी, राजस्थान या मत्स्य संघ के शासक थे, लेकिन उनका पतन स्य्न्थिअन् साथ आत्मसात से शुरू हुआ[कृपया उद्धरण जोड़ें] और पूरा जब ब्रिटिश सरकार उन्हे "आपराधिक जाति" मे डाल दिया। यह कार्रवाई, राजस्थान में राजपूत राज्य के साथ उनके गठबंधन के समर्थन मे लिया गया था विशेषता प्राचहिन समय मे मीणा राजा आलन सिंह ने, एक असहाय राजपूत माँ और उसके बच्चे को उसके दायरे में शरण दि। बाद में, मीणा राजा ने बच्चे, ढोलाराय को दिल्ली भेजा, मीणा राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए। राजपूत ने इस् एहसान के लिए आभार मे राजपूत सणयन्त्रकारिओ के साथ आया और दीवाली पर निहत्थे मीनाओ कि लाशे बिछा दि, जब वे पित्र तर्पन रस्में कर रहे थे। मीनाओ को उस् समय निहत्था होना होता था। जलाशयों को"जो मीनाऔ के मृत शरीर के साथ भर गये। "[Tod.II.281] और इस प्रकार कछवाहा राजपूतों ने खोगओन्ग पर विजय प्राप्त की थी, सबसे कायर हर्कत और राजस्थान के इतिहास में शर्मनाक। एम्बर के कछवाहा राजपूत शासक भारमल हमेशा नह्न मीना राज्य पर हमला करता था, लेकिन बहादुर बड़ा मीणा के खिलाफ सफल नहीं हो सका। अकबर ने राव बड़ा मीना को कहा था, अपनी बेटी कि शादी उससे करने के लिए। बाद में भारमल ने अपनी बेटी जोधा की शादी अकबर से कर दि। तब अकबर और भारमल की संयुक्त सेना ने बड़ा हमला किया और मीना राज्य को नस्त कर दिया। मीनाओ का खजाना अकबर और भारमल के बीच साझा किया गया था। भारमल ने एम्बर के पास जयगढ़ किले में खजाना रखा। MEENA IN INDIA मीणा जनजाति राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में भी पाई जाती है। यह सुनिश्चित है कि अन्य प्रदेशों में बसे मीणा लोगों का मूल निवास पहले राजस्थान ही था। यहीं से ये लोग अन्य प्रदेशों में जाकर बसे हैं। मीणा जाति में 12 पाल, 32 तर्ड़ें और 5200 गोत्र होना बताया जाता है, राजपूतों के आगमन से पहले राजस्थान की इस धरती पर इन्हीं लोगों के छोटे-छोटे राज्य थे।

मीणा मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से Jump to navigationJump to search मीणा जनजाति मीणा अथवा मीना मुख्यतया भारत के राजस्थान व मध्य प्रदेश राज्यों में निवास करने वाली एक जनजाति है। यह प्राचीन भारत की मत्स्य जन-जाति के वंशज है,।[1] राजस्थान राज्य में सभी मीणा आदिवासी हिन्दू अनुसूचित जनजाति हैं,[2] मीणा मध्यप्रदेश मेंं विदिशा के सिरोंज क्षेत्र को छोड़कर बाकी अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आते हैं। [3] [4]। कृतमाला नदी श्रीमत्स्य अवतार:- मत्स्य अवतार की उत्पत्ति कृतमाला नदी नदी किनारे हुई थी । वर्ग मीणा जाति प्रमुख रूप से निम्न वर्गों में बंटी हुई है जमींदार या पुरानावासी मीणा : जमींदार या पुरानावासी मीणा वे हैं जो प्रायः खेती एवं पशुपालन का कार्य बर्षों से करते आ रहे हैं। ये लोग राजस्थान के सवाईमाधोपुर,करौली,दौसा व जयपुर जिले में सर्वाधिक हैं| चौकीदार या नयाबासी मीणा : चौकीदार या नयाबासी मीणा वे मीणा हैं जो अपनी स्वछंद प्रकृति के कारण चौकीदारी का कार्य करते थे। इनके पास जमींने नहीं थीं, इस कारण जहां इच्छा हुई वहीं बस गए। उक्त कारणों से इन्हें नयाबासी भी कहा जाता है। ये लोग सीकर, झुंझुनू, एवं जयपुर जिले में सर्वाधिक संख्या में हैं। प्रतिहार या पडिहार मीणा : इस वर्ग के मीणा टोंक, भीलवाड़ा, तथा बूंदी जिले में बहुतायत में पाये जाते हैं। प्रतिहार का शाब्दिक अर्थ उलट का प्रहार करना होता है। ये लोग छापामार युद्ध कौशल में चतुर थे इसलिये प्रतिहार कहलाये। रावत मीणा : रावत मीणा अजमेर, मारवाड़ में निवास करते हैं। भील मीणा : ये लोग सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं चित्तोड़गढ़ जिले में प्रमुख रूप से निवास करते हैं। मीणा मुख्य रूप से राजस्थान राज्य में पाया जाने वाला एक समुदाय है। इस समुदाय का नाम मीन शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है मछली। ब्रिटिश शासन के समय, मीणा आदिवासी समुदाय को ‘आपराधिक जनजाति’ के रूप में प्रशंसित किया गया था। राजस्थान में राजपूत साम्राज्य के साथ अपना गठबंधन बनाए रखने के लिए यह कृत्य किया गया था, इस तथ्य को भी प्रकट करता है कि ये मीणा जनजाति अभी भी राजपूतों के साथ युद्ध में थीं, अपने खोए हुए राज्यों को पकड़ने के लिए छापामार हमलों में लिप्त थीं। मीणा मुख्य रूप से राजस्थान के पूर्वी भाग में रहते हैं, जिनमें सवाई माधोपुर जिला, दौसा जिला, जयपुर, धौलपुर और करौली जिले जैसे जयपुर और भरतपुर क्षेत्र शामिल हैं। वे भरतपुर जिले और बयाना जिले और शेखावटी क्षेत्र में जयपुर-सीकर और राज्य के उत्तर-पूर्व क्षेत्र अलवर में भी रहते हैं। इस समुदाय के लोग मध्य प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी भागों सहित कोटा, झालावाड़ और बूंदी में भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। अनुक्रम 1 मीणा जनजाति की उत्पत्ति 2 मीणा जनजाति का इतिहास 3 मीणा जनजाति की संस्कृति 4 मीणा जनजाति की वेशभूषा 5 इन्हें देखे 6 सन्दर्भ 7 बाहरी कड़ियाँ मीणा जनजाति की उत्पत्ति मीणा मौखिक इतिहास में कई मिथकों और किंवदंतियों के माध्यम से अपनी उत्पत्ति की कहानी बताते हैं। मीणा पौराणिक कथाएं, मत्स्य अवतार या भगवान विष्णु के दसवें अवतार से उनकी उत्पत्ति का पता लगाती हैं। मीणा राजस्थान में संख्यात्मक रूप से सबसे बड़ी जनजाति है। वे एक बार जयपुर और अलवर के पूर्व राज्यों पर शासन करते थे और अनिवार्य रूप से एक कृषि समुदाय थे। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, मीणा समुदाय के लोग `चैत्र शुक्ल पक्ष` के तीसरे तीथ पर विष्णु के नाम पर मीनेश जयंती मनाते हैं। यह विश्वास मुख्य रूप से मत्स्य पुराण के ग्रंथ पर आधारित है। मीणा जनजाति का इतिहास प्राचीन भारतीय ग्रंथ ऋग्वेद में दर्शाया गया है कि मीणाओं के राज्य को संस्कृत में मत्स्य साम्राज्य कहा जाता था। राजस्थान के मीणा जनजाति के लोग आज तक भगवान शिव, भगवान हनुमान और भगवान कृष्ण के साथ-साथ देवी (देवी) की पूजा करते रहे हैं। मीणा आदिवासी समुदाय भील जनजाति के समुदाय सहित अन्य जनजातियों के साथ अंतरिक्ष साझा करता है। वास्तव में ये मीणा जनजाति अन्य जनजातीय समुदायों के सदस्यों के साथ बहुत अच्छे संबंध साझा करती हैं। मीणा लोग वैदिक संस्कृति के अनुयायी हैं और यह भी उल्लेख किया गया है कि मीणा समूहों में भारमान और सिथियन पूर्वज थे। आक्रमण के वर्षों के दौरान, 1868 में मीणाओ के कई नए समूहों का गठन किया गया है, जो कि अकाल के तनाव के कारण राजपुताना को उजाड़ दिया। राजस्थान के इतिहास में मीणाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे पहले, राजपूत और मीणा प्रमुखों ने दिल्ली के तोर राजाओं के अधीन रहते हुए देश के एक बड़े हिस्से पर शासन किया। मीणा समुदाय को मुख्य रूप से चार बुनियादी क्षेत्रों में जमींदार मीणा, चौकीदार मीणा, परिहार मीणा और भील मीणा में रखा गया था। पूर्व में मिनस देश के विभिन्न संप्रदायों में बिखरे हुए थे और आसपास के क्षेत्र में बदलाव के कारण उनके चरित्र अलग-अलग हैं। करौली, सवाई माधोपुर, जयपुर, गंगापुर क्षेत्र के मिनस पिछले चार सौ वर्षों के लिए सबसे महत्वपूर्ण काश्तकार हैं। कई गाँवों से धनगर और लोधियों को मिनास द्वारा बाहर निकाला गया और उनके कब्जे को फिर से स्थापित करने में कामयाबी मिली। मीणा जनजाति की संस्कृति कहा जाता है कि मेओ जनसंख्या की उत्पत्ति मीणाओं से हुई थी और इस कारण से मीणाओं की नैतिकता और संस्कृति में समानता है। राजपूतों को मीणाओं, गुर्जर समुदाय, जाट और अन्य योद्धा जनजातियों का प्रवेश माना जाता है। त्यौहार, संगीत, गीत और नृत्य इस बात का प्रमाण हैं कि इन मीणा जनजातियों की संस्कृति और परंपरा काफी उज्ज्वल है। यद्यपि मीना जनजाति इन त्योहारों को प्राप्त करती हैं, लेकिन उन्होंने स्थानीय मूल के अपने अनुष्ठानों और संस्कारों को शामिल किया है। उदाहरण के लिए, नवरात्रि का सातवां दिन मीना जनजातियों के लिए उत्सव का समय है, जो कलाबाजी, तलवारबाजी और नाच-गाने के साथ आनन्दित होते हैं। मिनस दृढ़ता से विवाह की संस्था में विश्वास करते हैं। यह भोपा पुजारी हैं जो कुंडली के आधार पर मंगनी में शामिल होते हैं। इस राजस्थानी आदिवासी समुदाय में इस तरह के महान उत्सव के लिए बुलाते हैं। त्यौहारों की अधिकता मीना जनजातियों द्वारा भी मनाई जाती है। इस तथ्य की पुष्टि भगवान विष्णु के नाम पर मीनेश जयंती को प्राप्त करने की सैकड़ों प्राचीन संस्कृति से होती है। वे अपने समुदाय में जन्म, विवाह और मृत्यु से संबंधित सभी अनुष्ठानों को करने के लिए एक ब्राह्मण पुजारी को नियुक्त करते हैं। अधिकांश मिनास हिंदू धर्म का पालन करते हैं। मीणा जनजाति की वेशभूषा मीणा समुदाय के लोगों के कपड़े अन्य जनजातीय लोगों से काफी मिलते-जुलते हैं, मुख्यतः महिलाओं के कपड़े डिजाइन में सूक्ष्म अंतर के साथ शैली में बहुत समान हैं। एक मीना महिला की पोशाक में ओधना, घाघरा, कांचली और कुर्ती शामिल होती है। अविवाहित मीणा लड़कियां लुगडा नामक एक साड़ी पहनती हैं। दबी-वली लुडी एक विशेष ओधना है जो मीना महिलाओं द्वारा पहना जाता है और हमेशा लाल और हरे रंग का होता है। टखने की लंबाई वाला घाघरा, जो आमतौर पर नीले रंग के डिजाइन के साथ गहरे लाल रंग के कपड़े से बना होता है, एक मीणा महिला की पहचान करने के लिए एक विशिष्ट चिह्न है। मीणा महिलाएं गहने के साथ खुद को सजाना पसंद करती हैं। मीना महिलाओं का सबसे प्रमुख आभूषण `बोरला` है, जो उनकी वैवाहिक स्थिति का प्रतीक है। महिलाएं `हांसली` को गले में पहनती हैं, नाक में `नाथ`, कानों में `टिमनीया`,` पैंची’,`चूड़ी`,`गजरा` और हाथों में चूड़ियाँ और ऊपरी बाजुओं में `बाजूबंद` पहनती हैं। । सभी विवाहित महिलाएँ हमेशा लाख की बनी `चूड़ा` पहनती हैं। वे अपने पैरों पर `कडी` और` पाजेब` भी पहनते हैं। चांदी का उपयोग सिर और गर्दन के आभूषणों के लिए किया जाता है, जबकि पैरों के गहने पीतल से तैयार किए जाते हैं। मीणा महिलाएं आमतौर पर सोना नहीं पहनती हैं। वैवाहिक स्थिति के बावजूद, एक मीना महिला अपने बालों को ढीला नहीं करती है। बाल करना उनकी नियमित जीवन शैली का एक हिस्सा है। यह आमतौर पर माथे के बीच में होता है, जिसे `बोरला` के साथ बंद किया जाता है, जो विवाहित महिलाओं के मामले में नकली पत्थरों से जड़ी होती है। अविवाहित लड़कियां अपने बालों को एक ही ब्रैड में पहनती हैं, जो एक गाँठ में समाप्त होता है। मीणा व्यक्ति की पोशाक में धोती, कुर्ता या बंदगी और पगड़ी होती है, हालांकि युवा पीढ़ी ने शर्ट को पजामा या पतलून के साथ अपनाया है। सर्दियों के दौरान, मीणा पुरुष एक शॉल पहनते हैं जो उनके शरीर के ऊपरी हिस्से को कवर करता है। उनकी सामान्य हेडड्रेस पोटिया है, जिसे सजावटी टेप के साथ चारों ओर लपेटा जाता है। गोटा वर्क वाला रेड-प्रिंटेड हेडगियर भी पहना जाता है। एक शाल, जिसे गले में पहना जाता है, वह भी लाल और हरे रंग में होता है। दिलचस्प बात यह है कि शादी से मीणा व्यक्ति की वेशभूषा में बदलाव आता है। शादी के समय एक लंबा लाल रंग का ऊपरी वस्त्र पहना जाता है। यह बछड़ा-लंबाई वाला और सीधा है, जिसके किनारे लंबे हैं और पूरी आस्तीन के हैं। वे सामान्य रूप से धोती को निचले वस्त्र के रूप में पहनते हैं, जो कि टखनों के ठीक नीचे होता है। यह कड़ा पहना जाता है और `डॉलांगी` या` तिलंगी` धोती की तरह लिपटा होता है। मीना पुरुष ज्यादा आभूषण नहीं पहनते हैं। सबसे आम गहने कान के छल्ले होते हैं जिन्हें `मुर्की` कहा जाता है। शादी के समय अन्य सामान में एक बड़ी तलवार और कलाई पर एक `कड़ा` शामिल होता है। पुरुष अपने बालों को छोटा और आमतौर पर, खेल दाढ़ी और छोटी मूंछें पहनते हैं। मीणा समुदाय के साथ टैटू भी लोकप्रिय हैं। मीना महिलाएं अपने हाथों और चेहरे पर टैटू प्रदर्शित करती हैं। सबसे आम डिजाइन डॉट्स, फूल या उनके स्वयं के नाम हैं। वे अपनी आँखों में कोहल पहनते हैं और शरीर के अलंकरण के रूप में चेहरे पर काले डॉट्स। गोदना पुरुषों के साथ ही लोकप्रिय है और उनके नाम, पुष्प रूपांकनों, आकृतियों और देवताओं के साथ आमतौर पर उनके अग्रभाग हैं। मीना जनजातियों द्वारा बोली जाने वाली मुख्य भाषाओं में हिंदी भाषा, मेवाड़ी, मारवाड़ी भाषा, धुंदरी, हरौटी, मालवी भाषा, गढ़वाली भाषा, भीली भाषा, आदि शामिल हैं। इन्हें देखे भील गोंड सन्दर्भ Rabindra Nath Pati, Jagannatha Dash (2002). "Tribal and Indigenous People of India: Problems and Prospects". Ethenology. APH Publishing. पृ॰ 12. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788176483223. मूल से 12 अक्तूबर 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 8 October 2014. Yüksel Sezgin (2011). "Human Rights and Legal Pluralism". Social Science › General. LIT Verlag Münster. पृ॰ 41. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9783643999054. मूल से 12 अक्तूबर 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 8 October 2014. Mahendra Lal Patel (1997). "Awareness in Weaker Section: Perspective Development and Prospects". Economic development projects. M.D. Publications Pvt. Ltd. पृ॰ 35. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788175330290. मूल से 12 अक्तूबर 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 8 October 2014. Shri JAGDISH THAKOR, YOGI ADITYANATH, KHAGEN DAS & KIRODI LAL (19 August 2012). "Castes under proposal for inclusion in SC/ST Category". UNSTARRED QUESTION NO 651 by Shri JAGDISH THAKOR, YOGI ADITYANATH, KHAGEN DAS & KIRODI LAL. GCONNECT.IN. मूल से 19 जून 2015 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 19 June 2015. बाहरी कड़ियाँ How Meenas got ST status [छुपाएँ]देवासं भारत की जनजातियाँ अण्डमानी • अपात्तानी • आका • ईरुला • उत्तरी सेण्टिनली • उराली • ओंग • ओरांव • कच्छा • कबूई • कुकी • कोनयाक • कोरबा • कोली • किन्नर • खातमी • खाम्प्टी • खासी • गड़ावा • गरासिया • गलोंग • गारो • गिनीपोंग • गिरी • गुरुंग • गद्दी • गूजर • गोंड • चकमा • चांग • चिन • चुलीकाटा • चेंचू • जारवा • टोड़िया • टोडा • डफला • डाफर • डिगारी • डूबला • तुंगकुल • नागा • निकोबारी • पंतारम • पटेलिया • पदम • पनियान • पांगी • पासी • बदाली • बिरजा • बिरहोर • बेल्जियास • भील • पावरा • भुइया • भेरात • भोटिया • माल पहाड़िया • मालकुरवान • मालापत्रम • मालेर • मिकिर • मिश्मी • मुण्डा • मुथुबान • मेजू • मेव • मांझी • मीणा • रंगपान • डोङिया • खोंड • भोई • राठवा • कहार • रियांग • रेंगमा • रैबारी • रेड्डी • लखेर • लुशाई • लेपचा • लद्दाखी • लाहोली • नारी • शोपन • शोलिगा • संताम • संथाल • सन्याक • सहरिया • सिंगपो • सुमाली • सेमा • हो • थारू • वेद्दा • बैगा • बगोटा • बक्करवाल • बोडो Flag of India श्रेणियाँ: मानव प्रजातियांराजस्थान की जनजातियाँ

Meena Jump to navigationJump to search Author:Laxman Burdak, IFS (R) Meena (मीणा/मीना) is a tribe found mainly in the Rajasthan and Madhya Pradesh in India. Contents 1 Origin 2 Variants 3 Early History 4 History 5 Amber Kingdom of Meenas 6 The treachery of Dhola Rae to Meenas 7 Bundi Kingdom of Meenas 8 Nayan Kingdom of Meenas 9 Meenas in Jat History 10 Towns and villages founded by Meenas 11 Meena clans 12 Meena sub-divisions 13 राजस्थान का राजपूताना एक भ्रामक नाम 14 आमेर का इतिहास 15 ढुंढार रियासत 16 ढूंढाड़ अंचल का प्राचीन क़स्बा 17 गायों के लिए मीणों से तेजाजी का युद्ध 18 Notable persons 19 External links 20 References Origin The word Meena is derived from Meen (मीन), the Sanskrit word for fish, and the Meenas claim a mythological descent from the Matsya avatar, or fish incarnation, of Vishnu.[1][2] They also claim to be descendants of the people of the Matsya Kingdom, which flourished in the 6th century B.C.[3] Variants Mina (मीणा/मीना) Early History Dasharatha Sharma[4] considers Meenas in the list of Antyajas and writes....Last in the social scale stood the Antyajas. But even their Social status showed variety according to the occupations they followed and the amount of independence they enjoyed. The Medas formed an important section of the population and were in their forest and mountain haunts as influential as any other caste. Another Antyaja class, the Bhils, lived in various parts of the Aravalli hills and adjoining areas. An allied tribe was that of the Minas who lived in and at times terrorised parts of south east Rajasthan by their predator activities. The Bavaris, according to Dr. D.R. Bhandarkar, are perhaps referred to in the Jalor Inscription of V. 1239. [5] The Antyaja who helped Lakshmana in the foundation of his kingdom [6] may have been a Meena or Bhil or perhaps even a Bavari. Dr Naval Viyogi[7]calls Gonds, Bhils, Meenas etc as dasyus, a term applied to the aboriginal tribes of India as contra distinguished from Aryans. History The Meenas ruled at certain places in Rajasthan till they were overpowered by invading Rajputs. From Meenas the Dhundhar was captured by Kachhwaha Rajputs (A.D. 1129), Bundi was captured by Rao Dewa (Hara Rajput) (A.D. 1342), and Chopoli fell to the Muslim rulers. Kota, Jhalawar, Karauli and Jalore were the other areas of earlier Meena influence where they were forced to surrender ultimately.[8] Amber Kingdom of Meenas During 11th century Khoh (at present Khoh Nagoriyan near Jaipur) was ruled by Raja Aalan Singh Meena of Chanda Gotra. Meanwhile the kingdom of Gwalior (called Narwar at that time) was being ruled by Sodh Singh who was assassinated by his brother. The queen and her son (Dulha Rai or Dhola Rai, grand father of Bharmal) managed to flee the kingdom and were given refuge by the Aalan Singh who adopted that child as his nephew. It was her son who used the trust bestowed upon him by the king and conspired with Rajputs and attacked the fort when the Meenas were most vulnerable (during the Diwali time where they would give up arms for whole day and pay homages to their ancestors by taking dips in Badli's pond) (ancient tradition that is called pitratrapan).[9] Amber was capital of Meena kings. Its ancient name was Amrapura (आम्रपुर). Founded by the Meena Raja Alan Singh (He was from Chanda clan of Meenas), Amber was a flourishing settlement as far back as 967 AD. Around 1037 AD, it was conquered by the Kachwaha clan of Rajputs. Much of the present structure known as Amber fort is actually the palace built by the great conqueror Raja Man Singh I who ruled from 1590 - 1614 AD. Col. G. B. Malleson[10] writes.... The kingdom of Jaipur, better known as the kingdom of Amber or Dhundhar, was founded by Dhola Rae in the year 957. Dhola Rae was thirty-fourth in descent from Raja Nal, traditional founder of the kingdom and city of Narwar. Raja Nal is said to have been lineally descended from Kush, the second son of Rama, King of Koshala, whose capital was Ayodhya, the modern Oudh. Hence the reigning family in Jaipur has been known from time immemorial as the Katchhawa family or rule. The exploits of Dhola Rae can only be traced in the fabulous legends of the period. This much is clear that he conquered the country inherited by his descendants. That part of Rajasthan was then divided amongst petty Rajputs and Mina chiefs, all owing allegiance to the Hindu Kings of Delhi. These he conquered in succession, and marrying the daughter of the Prince of Ajmer, he laid the foundations of a kingdom destined to be permanent. Killed in battle, Dhola Rae was succeeded by his posthumous son by the daughter of the princess of Ajmer, named Kankal ; he, again, by his son Maidul Rao, a warrior and conquerer ; and he, in his turn, by Hundeo. Kuntal followed him, and he it was who completed the subjugation of the other aboriginal race of the Minas. The treachery of Dhola Rae to Meenas James Tod [11] writes...A case of simple usurpation originated the Cutchwaha state of Amber ; but it would be contrary to precedent if this event were untinged with romance. As the episode, while it does not violate probability, illustrates the condition of the aboriginal tribes, we do not exclude the tradition. On the death of Sora Sing, prince of Nurwar, his brother usurped the government, depriving the infant, Dhola Rae, of his inheritance. His mother, clothing herself in mean apparel, put the infant in a basket, which she placed on her head, and travelled westward until she reached the town of Khogong (within five miles of the modern Jeipoor), then inhabited by the Meenas. Distressed with hunger and fatigue, she had placed her precious burthen on the ground, and was plucking some wild berries, when she observed a hooded serpent rearing its form over the basket. She uttered a shriek, which attracted an itinerant Brahmin, who told her to be under no alarm, but rather to rejoice at this certain indication of future greatness in the boy. But the emaciated parent of the founder of Amber replied, " What may be in futurity I have not, while I am sinking with hunger ;" on which the Brahmin put her in the way to Khogong, where he said her necessities would be relieved. Taking up the basket, she reached the town, which was encircled by hills, and accosting a female, who happened to be a slave of the Meena chieftain, begged any menial employment for food. By direction of the Meena Rani, she was entertained with the slaves. One day she was ordered to prepare dinner, of which Ralunsi, the Meena Raja, partook, and found it so superior to his usual fare, that he sent for the cook, who related her story. As soon as the Meena chief discovered the rank of the illustrious fugitive, he adopted her as his sister, and Dhola Rae as his nephew. When the boy had attained the age of Rajpoot manhood (fourteen), he was sent to Dehli,1 with the tribute of Khogong, to attend instead of the Meena. The young Cutchwaha remained there five years, when he conceived the idea of usurping his benefactor's authority. Having 1. The Tuar tribe were then supreme lords of India. [p.321]: consulted the Meena dhadhi1 or bard, as to the best means of executing his plan, he recommended him to take advantage of the festival of the Dewali, when it is customary to perform the ablutions en masse, in a tank. Having brought a few of his Rajpoot brethren from Dehli, he accomplished his object, filling the reservoirs in which the Meenas bathed with their dead bodies. The treacherous bard did not escape ; Dhola Rae put him to death with his own hand, observing, " he who had proved unfaithful to one master, could not be trusted by another." He then took possession of Khogong. Soon after, he repaired to Deosah, a castle and district ruled by an independent chief of the Birgoojur tribe of Rajpoots, whose daughter he demanded in marriage. " How can this be," said the Birgoojur, " when we are both Suryavansi, and one hundred generations have not yet separated us ?"2 But being convinced that the necessary number of descents had intervened, the nuptials took place, and as the Birgoojur had no male issue, he resigned his power to his son-in-law. With the additional means thus at his disposal, Dhola determined to subjugate the Seroh tribe of Meenas, whose chief, Rao Natto, dwelt at Mauch. Again he was victorious, and deeming his new conquest better adapted for a residence than Khogong, he transferred his infant government thither, changing the name of Mauch, in honour of his great ancestor, to Ramgurh. Dhola Rae killed in war with Meenas: Dhola subsequently married the daughter of the prince of Ajmer, whose name was Maroni. Returning on one occasion with her from visiting the shrine of Jumwahi Mata, the whole force of the Meenas of that region assembled, to the number of eleven thousand, to oppose his passage through their country. Dhola gave them battle : but after slaying vast numbers of his foes, he was himself killed, and his followers fled. Maroni escaped, and bore a posthumous child, who was named Kankul, and who conquered the country of Dhoondar. His son, Maidul Rao, made a conquest of Amber from the Soosawut Meenas, the residence of their chief, named Bhatto, who had the title of Rao, and was head of the Meena confederation. He also subdued the Nandla Meenas, and added the district of Gatoor-Gatti to his territory. Conquest of Hoondeo: Hoondeo succeeded, and, like his predecessors, continued the warfare against the Meenas. He was succeeded by Koontul, whose sway extended over all the hill tribes round his capital. Having determined to proceed to Bhutwar, where a Chohan prince resided, in order to marry his daughter, his Meena subjects, remembering the 1 Dhadi, dholi, Dhom, Jaega, are all terms for the bards or minstrels of the Meena tribes. 2. The Birgoojur tribe claims descent from Lava or Lao, the elder son of Rama. As they trace fifty-six descents from Rama to Vicrama, and thirty-three from Raja Nala to Dhola Rae, we have only to calculate the number of generations between Vicrama and Nal, to ascertain whether Dhola's genealogist went on good grounds. It was in S. 351 that Raja Nal erected Nurwar, which, at twenty-two years to a reign, gives sixteen to be added to fifty-six, and this added to thirty-three, is equal to one hundred and five generations from Rama to Dhola Rae. Bundi Kingdom of Meenas James Tod[12] write...Rao Dewa, S. 1398 (AD. 1342), took the Bandu valley from the Meenas, founded the city of Bundi, and styled the country Harawati. James Tod[13] writes that having resigned Bumaoda to Hara-Raj, Rao Dewa came to Bandu-Nal, the spot where his ancestor Colun was cured of disease. Here the Meenas of the Usarda tribe dwelt, under the patriarchal government of Jaita, their chief there was then no regular city ; the extremities of the valley (thal) were closed with barriers of masonry and gates, and the huts of the Meenas were scattered wherever their fancy led them to build. It was in S. 1398 (A.D. 1342) that Jaita and the Meenas of Usarra clan acknowledged Rae Dewa the Hara Chauhan as their lord, who erected Bundi in the valley of the Bandu-ca-Nal, which henceforth became the capital of the Haras. Nayan Kingdom of Meenas An important kingdom of Meenas was on Naen or Nayan. It was ruled by Rao Bada Meena, which was destroyed by Bharmal Kachhawa (father of Jodha Bai) with aid from the Mughal connections. On its ruins he erected the town of Lowain. In local language there is a famous quotation , Rao Bada ko bijano akbar ko darbar, it means a hand made fan of Rao Bada in his palace was considered as having worth equivalent to the whole treasury of Akbar. Akbar wanted to marry Shashiwadini (daughter of Rao Bada Meena) but she refused to do so, after that Akbar married with Bharmal's daughter Jodhabai and the combined army of Akbar and Bharmal won the kingdom Naen and grab all treasure and buried that under the Chil ka Tila (a mountain, on which Jaigarh fort has been built). [14] Nandini Sinha Kapur, a historian who has studied early India, notes that the oral traditions of the Meenas were developed from the early 19th century AD in an attempt to reconstruct their identity. She says of this process, which continued throughout the 20th century, that "The Minas try to furnish themselves a respectable present by giving themselves a glorious past". In common with the people of countries such as Finland and Scotland, the Meenas found it necessary to invent tradition through oral accounts, one of the primary uses of which is recognised by both historians and sociologists as being "social protest against injustices, exploitation and oppression, a raison d'être that helps to retrieve the image of a community." Kapur notes that the Meenas not merely lack a recorded history of their own but also have been depicted in a negative manner both by medieval Persian accounts and records of the colonial period. From medieval times through to the British Raj, references to the Meenas describe them as violent, plundering criminals and an anti-social ethnic tribal group.[15] They celebrate Meenesh Jayanti on the third day of the Chaitra month's Shukla paksha.[16] Subdivisions Meenas in Jat History War of Jat King Maharaja Kartik with Hill Meenas: James Todd [17], obtained a Pali inscription about Jit or Jat tribe at village Ramchandrapura 3 kos (6 miles) east of Bundi state, which he sent to Asiatic Society London. The inscription reveals that there was a king Thot born in Uti vansha. His son was Raja Chandrasain, a powerful ruler and beloved king of his subjects. The son of Chandrasain was Kartika, renowned for his prowess. His wife was Gunaniwas, who gave birth to two sons Mukunda and Daruka. Daruka produced son named Kuhal. Kuhal produced son named Dhunak, who achieved great works. He had war with Hill Meenas tribes and defeated and destroyed them. He along with his brother Dok worshipped gods and brahmanas. They founded a Sun-temple for the pleasure of his beloved wife. The temple will stand till the sumer suvarna mountain stands on the sand. Kuhal had founded this temple and a Maheshwar temple in east. The popularity of this was spread by Achal, son of Mahabali Maharaja Yashovarma. [18] The period of war of this dynasty with Pahari Meenas is difficult to be assessed. If we assume that Jat ruler Kartik had war with Menander then the period of this comes about 150 BC. Menander had attacked areas upto Chittor. It is very likely that Kartika had a war with Menander. This way the period of his descendant becomes the first century. If we look into the period of Achal who made this temple popular it comes around third or fourth century or beyond it, as ruler Yashovarman was in Maukhari vansha in eighth century in Kannauj. He had sent a delegation to China in 731 AD. [19] Lack of records and history prior to sixth century prevents prom determining the exact period of the rule of Kartik and his descendants. According to Thakur Deshraj, We can presume their rule from fourth to sixth century. [20] Towns and villages founded by Meenas Amber (Jaipur): Founded by the Meena Raja Alan Singh (He was from Chanda clan of Meenas), Amber was a flourishing settlement as far back as 967 AD. Aund Meena (Dausa, Rajasthan) Dabla Meena Alwar, Rajasthan) Dantala Meena (Jaipur, Rajasthan) Gaitor (Jaipur): Gaitor gets name from Meena clan ruler named Gaita Meena prior to its occupation by Dulahrai Kachhwaha. [21] Gaoda Meena (Karauli, Rajasthan) Gohandi Meena (Dausa, Rajasthan) Gurha Meena (Jaipur, Rajasthan) Jamuniya Meena (Mandsaur, MP) Jhotwara (Jaipur): Jhotwara gets name from Meena clan ruler named Jhota Meena prior to its occupation by Dulahrai Kachhwaha. [22] Kalwar Meena (Karauli, Rajasthan) Kankaria Meena (Narsinghgarh, MP) Kankaria Meena (Sarangpur Rajgarh, MP) Khejda Meena (Rajgarh Madhya Pradesh) Kherkhera Meena (Baran,Rajasthan) Khilchipur Meena (Karauli, Rajasthan) Kotri Meena (Bhilwara, Rajasthan) Lasudiya Meena (Rajgarh Madhya Pradesh) Meena Baroda (Sawai Madhopur, Rajasthan) Meena Kheri (Sawai Madhopur, Rajasthan) Meena Koleta (Sawai Madhopur, Rajasthan) Meena Seemla (Dausa, Rajasthan) Meena Theekri (Sawai Madhopur, Rajasthan) Meena Ka Khera (Bhilwara, Rajasthan) Meena Umariya (Vidisha, MP) Meena Ki Nangal (Sikar, Rajasthan) Mina Majra (Sonipat, Haryana) Nagla Meena (Karauli, Rajasthan) Nanukhedi Meena (Agar, MP) On Meena (Sawai Madhopur, Rajasthan) Sikroda Meena (Karauli, Rajasthan) Toda Meena (Dausa, Rajasthan) Meena clans The Meena tribe is divided into several clans and sub-clans (adakhs), which are named after their ancestors. Some of the adakhs include[23] : Ahari Ariat Bamna Bhagora Bhil Chanda Charpota Chita Dadia Dadore Dali Damia Damore Doma Ghoghra Hela Hurat Kalsua Katara Kharadi Khat Mahinda Manaut Nanama Parihar Parmar Phargi Rana Seroh Ujwal Usarda Wagat Meena sub-divisions Bhil Meena is another sub-division among the Meenas. As part of a sanskritisation process, some Bhils present themselves as Meenas, who hold a higher socio-economic status compared to the Bhil tribal people.[24] A sub-group known as "Ujwal Meena" (also "Ujala Meena" or "Parihar Meena") seek higher status, and claim to be Rajputs, thus distinguishing themselves from the Bhil Meenas. They follow vegetarianism, unlike other Meenas whom they designated as "Mailay Meena".[25] Other prevalent social groupings are Zamindar Meena and the Chaukidar Meena. The Zamindar Meena, comparatively well-off, are those who surrendered to powerful Rajput invaders and settled on the lands believe to be granted by the Rajputs. Those who did not surrender to Rajput rule and kept on waging guerrilla warfare are called the Chaukidar Meena.[26] राजस्थान का राजपूताना एक भ्रामक नाम ठाकुर देशराज[27] ने लिखा है....राजस्थान, जिसे कि प्रायः राजपूताने के नाम से पुकारा जाता है, प्राचीन समय में अनेक नामों से, अनेक प्रदेशों में बंटा हुआ था। राजपूत, जिनके नाम से यह प्रान्त मशहूर हहुआ, उनका सातवीं-आठवीं सदी में राजपूताने में आना सिद्ध होता है। सोलहवीं सदी से पहले भी यह देश, एक नाम राजपूताने की बजाय प्रदेश वार अनेक नामों से पुकारा जाता था। इस नाम की बुनियाद अकबर के जमाने में पड़ी, किन्तु प्रचार नहीं हुआ। पूर्ण रूप से राजपूताना नाम का प्रचलन टाड के ‘राजस्थान’ के लिखे जाने के पश्चात् अंग्रेज-सरकार के राज्यकाल में प्रसिद्ध हुआ है। अभी पिछले दिनों, राजपूताना या राजस्थान नाम पर एतराज करते हुए, कुंवर सूआलालजी सैल बी. ए. के विद्यार्थी ने यह भी इच्छा प्रकट की थी कि इसका नाम, संख्या के अनुपात से ‘जाटपूताना’ या जाटस्थान होना चाहिए फिर भी, मैं इस मत का समर्थन नहीं करता कि इस प्रदेश का नाम ‘जाटपूताना’ अथवा ‘जाटस्थान’ रखा जाय। मेरी दृष्टि से उचित यही है कि इस प्रदेश का नाम ‘वीरभूमि’ रख दिया जाय। ‘राजपूताना’ नाम से यह भ्रम उत्पन्न होता है कि यह राजपूतबहुल प्रदेश है अथवा इसके गौरवशाली इतिहास के निर्माण में अनुपमेय भूमिका केवल राजपूतों की रही है, जबकि ऐतिहासिक सत्य यह बताता है कि राजपूतों के साथ-साथ, जाटों, भीलों, अहीरों, गूजरों, मीनाओं तथा कुछ अन्य जातियों ने भी इसके महान इतिहास के निर्माण में योग दिया है। इन सभी जातियों ने अपने नियम-विधानों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े संकट और अपमान सहे हैं। साथ ही, वे लाखों की संख्या में, आन और मान की रक्षा के लिए, बलिदान भी हुए हैं। भीलों के त्याग और वीरता भुलाने की चीज नहीं है। उदयपुर को ‘हिन्दुआं सूरज’ की उपाधि दिलाने में भीलों का जो खून बहा था, उसका मूल्य कौन चुका सकता है? आमेर का इतिहास जयपुर शहर की स्थापना 18.11.1727 को महाराजा सवाई जयसिंह ने की थी. जयपुर शासकों के पूर्वज कछवाहों की प्राचीन राजधानी आमेर थी. कहा जाता है कि 1129 ई. के लगभग कछवाहों को परिहारों ने ग्वालियर से निकाल दिया था. ग्वालियर से निष्कासित होने के बाद कछवाहों ने आमेर के मीणा शासकों की सहायता से ढूंढार रियासत की स्थापना की. आमेर ढूंढार की ही राजधानी थी. आमेर का काली मंदिर बहुत प्राचीन है. कछवाहों के आमेर बसाने से पूर्व काली यहाँ के आदि शासक मीणा लोगों की इष्ट देवी थी. आमेर नाम की व्युत्पत्ती भी अंबानगर नगर से हुई मानते है. न.ला. डे के अनुसार आमेर का असली नाम अंबरीशपुर था और इसे पौराणिक नरेश अंबरीश ने बसाया था. [28] कुछ इतिहासकार आमेर का प्राचीन नाम आम्रपुर भी बताते हैं. दशरथ शर्मा[29] ने हम्मीरमहाकाव्य (IV. 82) में उल्लिखित आम्रपुर का संज्ञान आमेर के रूप में लिया है.[30] मीणा शासकों ने अनेक स्थानों के नाम भी दिये हैं. जयपुर शासकों की छतरी गेटोर का नाम गेटा मीणा और झोटवाड़ा का नाम झोटा मीणा के नाम पर पड़ा है.[31] आमेर की स्थापना मीणा राजा आलनसी ने की थी. यह स्थान 967 ई. में भी आमेर के आबाद होने के प्रमाण हैं. 1037 ई. में कछवाहा शासकों ने इसे विजित किया. यहाँ की अधिकांश संरचनाएं राजा मानसिंह प्रथम (1590-1614 ई.) के समय में निर्मित की गई थी. जयसिंह द्वितीय ने 1727 ई. में जयपुर शहर बसाकर अपनी राजधानी नए नगर में बनाई. ढुंढार रियासत विजयेन्द्र कुमार माथुर[32] ने लेख किया है ...ढुंढार, आमेर (जयपुर, राजस्थान) की रियासत का मध्य युगीन तथा परवर्ती नाम है। इस रियासत की स्थापना कछवाहों ने ग्वालियर से निष्कासित होने के पश्चात् जंगली मीनाओं की सहायता से की थी। 'ढुंढार' राजस्थान की राजधानी जयपुर का पुराना नाम था। ढुंढार का उल्लेख तत्कालीन साहित्य तथा लोक कथाओं में है- 'मेवार ढुंढार मारवाड़ औ बुंदेलखंड, झारखंड बांधौधनी चाकरी इलाज की।'[33] कहा जाता है कि 1129 ई. के लगभग जब ग्वालियर से कछवाहों को परिहारों ने निष्काषित कर दिया तो उन्होंने आमेर के इलाके में मीनाओं की सहायता से ढुंढार रियासत की नींव डाली। ढुंढार के स्थान पर बाद में आमेर की प्रसिद्ध रियासत बनी। (दे. आमेर, जयपुर)) ढूंढाड़ अंचल का प्राचीन क़स्बा जमवारामगढ़ ढूंढाड़ अंचल का प्राचीन क़स्बा है जो जयपुर से उत्तर-पूर्व में 30 किमी दूरी पर स्थित है. जयपुर शहर के पानी की पूर्ती यहाँ के बाँध से होती है. कछवाहों के आगमन से पूर्व यह स्थान मांच (मंच) कहलाता था. यहाँ सीहरा वंशीय मीणों का राज्य था. मांच में उस समय वंश का राव नाथू राज्य करता था. उसका पुत्र मेदा था. राज्य स्थापना के क्रम में दूलहराय का मंच के मीणा शासक से युद्ध हुआ. दूलहराय ने स्थान का नाम राम के नाम पर रखा रामगढ़. यहीं जमवायमाता का मंदिर बनवाया. जमवाय माता कछवाहों की कुलदेवी के रूप में मानी जाती है. दूलहराय ने बाद में मीणों के अन्य संस्थान - चांदा मीना की खोह, गेटा मीना का गेटोर, तथा झोटा मीना का झोटवाड़ा पर अधिकार कर लिया। आगे चलकर कछवाहों की राजधानी आमेर होने के बाद भी रामगढ़ का महत्व हुआ यह वहाँ के शिलालेख से ज्ञात होता है.[34] गायों के लिए मीणों से तेजाजी का युद्ध मंडावरिया पर्वत की तलहटी स्थित रण संग्राम स्थल तेजाजी की मीणो पर विजय का स्थान, तोलामाल मंडावरिया पर्वत की तलहटी स्थित रण संग्राम स्थल के देवले समर दौरान झाड़ी में टिका लीलण का घुटना उजड़े हुए चांग गांव के चिन्ह - ठीकरे उजड़े हुए चांग गांव का मेर मीणा का बाड़ा संत श्री कान्हाराम[35] ने लिखा है कि....शहर पनेर तेजाजी का ससुराल था। यह गाँव वर्तमान में राजस्थान के अजमेर जिले की किशनगढ़ तहसील में स्थित है। यह किशनगढ़ से 30-32 किमी उत्तर दिशा में है। तेजाजी के वीरगति स्थल सुरसुरा से 15-16 किमी उत्तर-पश्चिम दिशा में है। जिला मुख्यालय अजमेर से उत्तर पूर्व दिशा में 60 किमी दूर है। नागौर जिले के परबतसर से सिर्फ 4 किमी दक्षिण पूर्व में है। उस जमाने में तेजाजी के श्वसुर रायमल जी मुहता यहाँ के गणपति थे। शहर पनेर उनके गणराज्य की राजधानी थी। तेजजी पत्नी पेमल को लेने के लिए ससुराल में आए हुये थे. पेमल की सहेली थी लाछां गूजरी। वह शहर पनेर के दक्षिण पूर्व की ओर रंगबाड़ी के बास (मोहल्ला) में रहती थी। संत श्री कान्हाराम[36] ने लिखा है कि तेजजी जब ससुराल शहर पनेर में रुके हुये थे इसी दौरान लाछां गुजरी की गायों का अपहरण मीणों द्वारा कर लिया गया। गायें छुड़ाने के लिए मीणों से तेजाजी का युद्ध हुआ जिसमें तेजजी वीरगति को प्राप्त हुये. इस युद्ध का विवरण निम्नानुसार है: मीणों द्वारा गायों का हरण - [पृष्ठ-240]: लाछा, पेमल, तेजाजी की सुख-दुख की बातें खत्म ही नहीं हुई थी कि अपने हरकारे का शोर सुनकर लाछा दौड़कर जाती है। हरकारे ने बताया कि बाड़े से चांग के मीणा गायें हरण कर ले गए हैं। लाछां गुजरी ने तेजाजी को बताया कि मीणा चोर उसकी गायों को चुरा कर ले गए हैं। तेजाजी ने कहा लाछा गाँव के जागीरदार रायमल जी को सूचना कर लारू, ताल, ढ़ोल बजवा। गाँव में आवाज लगवा। सबके साथ मैं भी गायों को छुड़ाकर लाता हूँ। तुम चिंता मत करो। लाछा शहर पनेर के गणपति रायमलजी मुहता के पास जाती है और फरियाद सुनाती है। रायमल जी ने बहाना बनाया। लाछा ढोली के पास जाकर ढ़ोल बजाने के लिए कहती है कि तुम बारहवाँ थाप बजाकर गाँव को सचेत करो। फिर वह गाँव के उन लोगों के पास गई जो गाँव में आवाज लगाकर सूचना देते थे। तभी उसे पता लगा कि तेरी गाय पेमल की माँ के इशारे पर चांग के मीणा ले गए हैं। चांग के मीणा के बदमाश दल का मुखिया कालिया मीणा था, जो पेमल की माँ का धरम भाई था। पेमल की माँ ने ही सबको तेरी सहायता के लिए माना किया है । लाछां गुजरी की तेजाजी से गुहार - लाछा ने आकर तेजाजी को सारी हकीकत बताई। अब उनके सिवाय उसका कोई मददगार नहीं। लाछां गुजरी ने तेजाजी से कहा कि आप मेरी सहायता कर अपने क्षत्रिय धर्म की रक्षा करो अन्यथा गायों के बछडे भूखे मर जायेंगे। तेजा ने कहा राजा व भौमिया को शिकायत करो। लाछां ने कहा राजा कहीं गया हुआ है और भौमिया से दुश्मनी है। तेजाजी ने कहा कि पनेर में एक भी मर्द नहीं है जो लड़ाई के लिए चढाई करे। तुम्हारी गायें मैं लाऊंगा। तेजाजी फिर अपनी लीलण घोड़ी पर सवार हुए। पंचों हथियार साथ लिए। लाछा व पेमल ने कहा कि आप अकेले 350 से युद्ध कैसे कर पाएंगे। गायें गई तो गई, फिर पाल लेंगे। पेमल ने घोडी की लगाम पकड़ कर कहा कि मैं साथ चलूंगी। लड़ाई में घोड़ी थाम लूंगी। तेजा ने कहा पेमल जिद मत करो। मैं क्षत्रिय धर्म का पालक हूँ। मैं अकेला ही मीणों को हराकर गायें वापिस ले आऊंगा। पेमल की विनती – [पृष्ठ-241]: पेमल ने कहा कि पतिदेव आप अकेले वो 350, अंधेरी काली रात है। बिजली चमक रही है और वर्षा हो रही है। आगे जंगल और पहाड़ है। क्या होगा? पेमल अन्दर ही अन्दर कांप भी रही थी और बुदबुदाने लगी - डूंगर पर डांडी नहीं, मेहां अँधेरी रात पग-पग कालो नाग, मति सिधारो नाथ अर्थात पहाड़ों पर रास्ता नहीं है, वर्षात की अँधेरी रात है और पग-पग पर काला नाग दुश्मन है ऐसी स्थिति में मत जाओ। तेजाजी धर्म के पक्के थे सो पेमल की बात नहीं मानी और पेमल से विदाई ली। तेजाजी ने कहा पेमल तू अब अपने पिता के घर लोट जा। तेजाजी के आदेश के सामने पेमल चुप हो गई। पेमल ने कहा मैं तेजा की अर्धांगिनी इतनी कायर दिल नहीं कि अपने पति के क्षत्रिय धर्म पालन में अड़ंगा लगाऊँ। गायों को छुड़ाने की तैयारी - [पृष्ट-242]: तेजाजी कमर में ढाल-तलवार कसते हैं। कंधे पर धनुष धारण करते हैं। पीठ पर तूणीर बांधते हैं। पेमल ने तेजाजी को भाला सौंपा। तेजाजी लीलण पर जीन, लाला ऊबटा कसते हैं। केसरिया जामा पहनते हैं। सिर पर पचरंग पाग और और उस पर कलंग लगाते हैं। लीलण की पीठ पर सवार होते हैं। लाछा तिलक लगाती है। पेमल आरती उतारती है तथा जाने की आज्ञा प्रदान करती है। शूर न पूछे टिप्पणो, शुगन न पूछे शूर। मरणा नूं मंगल गिणै, समर चढ़े मुख नूर।। तेजाजी का गायें छुड़ाने हेतु प्रस्थान – तेजाजी घोर अंधेरी रात में गायें छुड़ाने चल पड़ते हैं। आसमानी बिजली की चमक के सहारे गायों के खुर चिन्हों को देखते हुये मीणों का पीछा करते हैं। वर्तमान सुरसुरा नामक स्थान पर उस समय घना जंगल था। वहां बासग नाग ने एक लीला रची। बासगनाग साँप के रूप में आग की चपेट में आ जाते हैं। नाग बचने के लिए छटपटा रहे थे। तेजाजी ने भाले की नोक से बासगनाग को अग्नि से बाहर निकाल दिया। बासगनाग क्रोधित हुये और कहा कि मैं मोक्ष गति को प्राप्त करने जा रहा था [पृष्ठ-243]:तेजा तूने मेरी मोक्ष गति को अड़ंगा लगाया। अतः मैं तुझे डसूँगा। तेजाजी ने विश्वास दिलाया कि मैं धर्म से बंधा हूँ। संकट में पड़े प्राणी को बचाना मेरा धर्म था। पर नाग नहीं माना। तेजा ने कहा मैं धर्म के कर्म से लाछा की गायें बचाने जा रहा हूँ। गायें लाने के पश्चात् वापस आऊंगा। मेरा वचन पूरा नहीं करुँ तो समझना मैंने मेरी माँ का दूध नहीं पिया है। नागराज ने कहा कि तेरी शाख कौन भरेगा? तेजाजी ने कहा इस जंगल में मेरी शाख चाँद, सूरज तथा खेजड़ी का वृक्ष भरेगा। तब नागराज ने अपना असली रूप प्रकट किया। तेजा ने नागराज को प्रणाम किया और कहा कि गौमाता को छुड़ाकर जल्दी लौट रहा हूँ। नागराज ने प्रसन्न होकर तेजाजी को आशीर्वाद दिया और कहा तेजा तेरी जीत होगी। [पृष्ठ-244-248]: वहां से तेजाजी ने भाला, धनुष, तीर लेकर लीलण पर चढ़ कर चोरों का पीछा किया. सुरसुरा से 15-16 किमी दूर मंडावरिया की पहाडियों में मीणा दिखाई दिए। तेजाजी ने मीणों को ललकारा। तेजाजी ने बाणों से हमला किया। घनघोर लड़ाई छिड़ गई। तेजाजी मीणों के बीच पहुंचे। तेजाजी ने मुख्य शस्त्र बीजल सार भाला संभाला। भाले के एक-एक वार से सात-सात का कलेजा एक साथ छलनी होने लगा। यह अपने किस्म की अनोखी और अभूतपूर्व लड़ाई थी। एक तरफ 350 यौद्धा तो सामने केवल अकेले तेजाजी। भाले से मार-मार कर तेजा ने मीणों के छक्के छुड़ा दिये। मेर-मीणों में से बहुत संख्या में मारे गए तथा बचे लोग प्राण बचाकर भाग खड़े हुये। इस लड़ाई में तेजा के साथ केवल घोड़ी लीलण थी। लीलण ने भी अपनी टापों से मीणों के चिथड़े बिखेर दिये। कहते हैं कुछ देर में गौमाताएँ भी तेजा को पहचान गई, उन्होने भी सींगों से हमला शुरू कर दिया। मीने ढेर हो गए, कुछ भाग गए और कुछ मीणों ने आत्मसमर्पण कर दिया। तेजा का पूरा शारीर घायल हो गया और तेजा सारी गायों को लेकर पनेर पहुंचे और लाछां गूजरी को सौंप दी। लाछां गूजरी को सारी गायें दिखाई दी पर गायों के समूह के मालिक काणां केरडा नहीं दिखा। मीणा लोग उसे ले भागे थे। काणा केरडा उत्तम नागौरी नस्ल थी। काणां केरडा नहीं पाकर लाछा उदास हो गई। तेजा के लिए यह अपनी मूंछ का सवाल था। तेजाजी वापस गए। [पृष्ठ-248]: मंडावरीय की पहाड़ी की तलहटी के युद्ध स्थल से पनेर की दूरी 30-32 किमी पड़ती है। इतनी ही तेजा को वापस युद्ध स्थल पर जाने में हुई। अतः 50-60 किमी के अंतराल के कारण मेर-मीणा बछड़े को लेकर नरवर की घाटी से होकर वर्तमान पाली सीमांतर्गत ब्यावर से 10 किमी पश्चिम में पहाड़ियों में बसे अपने मूल गाँव चांग- चितार की ओर निकल गए। तेजा ने पद चिन्हों के द्वारा मीणों का पीछा करते हुये नरवर की घाटी में चलते हुये मीणा को लड़ने की चुनौती दी। मीणा ने बछड़े को ले जाने के लिए यहाँ एक रणनीति अपनाई। एक गुट तेजा से भीड़ गया एवं दूसरा गुट बछड़े को लेकर ईडदेव सोलंकी के भुवाल नगर के पास से होकर चांग- चितार की ओर निकल गया। नरवर की घाटी में भिड़े गुट का खात्मा कर आगे बढ़ा तो तेजा को जनता द्वारा पता चला कि मीणा मेर चांग- चितार गाँव के हैं और बछड़े को लेकर चांग के पास पहुँचने वाले होंगे। तेजा ने लीलण को तेज चलने का इसारा किया। चांग गाँव पहुँचने से पहले 1.5 किमी पहले ही तेजा ने मीणा को ललकार दिया। पहाड़ियों के बीच ऊबड़-खाबड़ स्थान एवं भयंकर जंगल में मीणा तथा तेजा के बीच फिर युद्ध छिड़ गया। मीणा का गाँव चांग नजदीक होने के कारण उनके वंश के कुछ और लोग मीणा की मदद के लिए आ गए। यहाँ पर ओर भी भयंकर लड़ाई हुई। इसमें एक-एक करके सारे मीणों के कलेजे तेजा के भाला ने छलनी कर दिये। घोड़ी की लगाम अपने दाँत से पकड़ी और एक हाथ में भाला तथा दूसरे हाथ में तलवार लेकर असंख्य मीणों को मार दिया। मीणों की भूमि में मीणों पर इस प्रकार की मार पड़ी कि वे थर्रा उठे। अपने प्राणों की भीख मांगते हुये बच कर भाग खड़े हुये। इस लड़ाई में तेजा अत्यधिक घायल हो गए। तेजा ने लीलण को इसारा किया। बछड़े को साथ लेकर तेजा उन्हीं खोजों वापस रंगबाड़ी पनेर आ गए। प्रथम समर भूमि चांग – नष्ट हो चुके इस चांग गाँव की भूमि तेजाजी और लाछां की गायें हरण करने वाले मेर-मीणों की समर भूमि है। [पृष्ट-249]: युद्ध स्थल की यह भूमि अजमेर की किशनगढ़ तहसील के गाँव मंडावरिया की पहाड़ी की उत्तर-पूर्वी तलहटी में स्थित है। मंडावरिया पर्वत की तलहटी स्थित रण संग्राम स्थल मंडावरिया - यह मंडावरिया गाँव किशनगढ़ से से 3-4 किमी पूर्व में अजमेर-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग-8 के उत्तरी दिशा में आबाद है। इस गाँव से सटकर पूर्व दिशा में करीब 2.5 किमी उत्तर-दक्षिण दिशा की तरफ फैली पहाड़ी है। पहाड़ी की चौड़ाई आधा किमी के लगभग है। इस पहाड़ी के पूर्व दिशा में लगभग 2.5 किमी की दूरी पर तोलामाल गाँव बसा है। उससे 2 किमी पूर्व चुंदड़ी गाँव बसा है। इस पहाड़ी की उत्तर दिशा में 2-3 किमी दूरी पर फलौदा गाँव है। तथा 6-7 किमी की दूरी पर तिलोनिया गाँव है। पहाड़ी के उत्तरी-पूर्वी छोर की तलहटी में पहाड़ी से लेकर करीब 4 किमी पूर्व तक तथा 2 किमी चौड़ाई में गायें छुड़ाने के लिए तेजाजी का मेर-मीणा लोगों के साथ मूसलाधार वर्षा तथा तूफानी काली रात में भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध के अवशेष यहाँ के चप्पे-चप्पे में विद्यमान हैं। पहाड़ी के उत्तरी-पूर्वी तलहटी के छोर के करीब 1 किमी नीचे सेवड़िया गोत्र के तेज़ूराम जाट का कुआ है जो तोलामाल गाँव की सीमा में पड़ता है। इस कुआ के इर्द-गिर्द इस युद्ध से संबन्धित हल्के लाल गुलाबी रंग के पत्थर के लड़ाई में मारे गए लोगों के देवले मौजूद है। गाँव के पुराने लोग बताते हैं कि वर्षों पहले यहाँ बहुत संख्या में मूर्तियाँ देवले थे परंतु आज की स्थिति में 3 देवले सही हालत में सुरक्षित बचे हुये हैं। मंडावरिया पर्वत की तलहटी स्थित रण संग्राम स्थल के देवले [पृष्ठ-250]: ग्रामीणों द्वारा ये देवले तोड़ दिये गए हैं जिनके कुछ अवशेष सरक्षित देवले के पास छोटे टीले में दबे पड़े हैं। बचे हुये देवलों के ऊपर देवनागरी लिपि में खुदाई की हुई है किन्तु पुराने और घिसे होने के कारण पढे नहीं जा सकते। आधे अधूरे अक्षर जो पढ़ने में आ रहे है वे इस प्रकार हैं – रण, पग, रण संग्राम ला, स, सा, बदी महिना, बा, घ, रा, 1048 अथवा 1040 जैसे अंक पढे जा सके हैं लेकिन तारतम्य नहीं बैठ पाया। हमारे खोजी दल ने उस स्थान पर तीन बार खोज की तब सेवड़िया परिवार ने बताया कि कुछ टूटी हुई मूर्तियाँ कुए की खुदाई में भी निकली हैं। समर दौरान झाड़ी में टिका लीलण का घुटना कुए से पूर्व दिशा में चूंदड़ी गाँव के पलटी में कैर की झाड़ी में एक तेजाजी का स्थान है। जिसके बारे में दृढ़ मान्यता है कि इस स्थान पर लड़ते हुये तेजाजी का घुटना टिका था जिसे संभाल कर लीलण ने वापस अपनी पीठ पर ले लिया था। पहाड़ी के नीचे पत्थरों का बना एक बाड़ा है जिनके अब अवशेष मात्र बचे हैं। उसे वहाँ के लोग मेर मीनों का बाड़ा कहते हैं। [पृष्ठ-251]: उस बाड़ा से नीचे उजड़े हुये गाँव के अवशेष रूप में मोटी-मोटी ठीकरियाँ व जमीन से राख़ निकलती है। श्रुति परंपरा के मर्मज्ञ भारमल जी चौधरी आदि का कहना है कि यही वह मीनों मेरों का चांग गाँव था जो तेजाजी की लड़ाई में नष्ट हो चुका था। इस चांग गाँव के अवशेष कुछ लंबाई चौड़ाई में फैले हैं। पहाड़ी में ऊपर की ओर मीनों का भैरू जी का स्थान है, जो अब उजड़ गया है। इस उजड़े हुये गाँव की तरफ से पहाड़ी पर चढ़ने पर पहाड़ी के अंदर की तरफ एक दर्रा दिखाई देता है जो इन गायों को हरण कर छिपाने के लिए काफी उपयोगी रहता था। पहाड़ी की पश्चिम दिशा में थोड़ा उत्तर दिशा की ओर बढ़कर जरूर इस दर्रे का रास्ता खुलता है लेकिन पूर्व की ओर देखने में यह दर्रा काफी बीहड़ और दिलचस्प दिखाई देता है। हमने तेजाजी के युद्ध संबंधी अवशेषों को ढूँढने के लिए इस पूरे युद्ध क्षेत्र का एवं पहाड़ी क्षेत्र का चप्पा-चप्पा ढूंढा है। यहाँ पर यह गाँव पशुधन हरण हेतु स्थाईरूप से बसा रखा था। मूल चांग गाँव पाली जिले के करणा जी की डांग में था। गायें छुड़ाकर पनेर प्रस्थान – [पृष्ठ-251]: झगड़ा जीतकर तेजाजी गायों को लेकर चले। गायें तेजाजी को चारों ओर से घेरकर चलने लगी। पनेर शहर पहुँच कर रंग बाड़ी बास में तेजाजी ने लाछा को एक-एक गाय संभलाई। गिण गिण गाय संभालो लाछा गुर्जर ए । दूधड़लो पिलाओ बालक बाछड़ां॥ गायें संभलाने के दौरान लाछा से पता चलता है कि गायों का मांझी काणा केरड़ा, जो सूरज की छाप वाला सांड बनने वाला था उसे मीणा ले गए हैं। इस सांड के बिना दुधारू और सुंदर स्वस्थ गायों की नस्ल समाप्त हो जाएगी। काणा केरड़ा न आने से तेजाजी ने इसे अपना अधूरा धर्म पालन समझा। तेजाजी के लिए नाक का सवाल भी पैदा हो गया। तेजाजी को अपनी यह जीत जीत खंडित सी लगी। तेजा ने कहा मुझे तो वैसे ही अब अपने लोक जाना है क्योंकि मेरा समय पूरा हो गया है। बासगनाग को वचन दे आया हूँ तो धर्म का काम अधूरा क्यों छोड़ूँ। केरडा को छुड़ाकर लाना ही होगा। तेजाजी ने लीलण को वापस उसी दिशा में मोड दी जिस दिशा में मीणा लोग भागे थे। नरवर घाटी नरवर घाटी – [पृष्ठ-253]: तेजाजी ने मीणों का पीछा किया। गायों को लेकर तेजाजी 30-32 किमी दूर पनेर तक आए। और इतनी ही दूर तक वापस आए तब तक मीणा टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलते हुये नरवर की घाटी तक पहुँच गए थे । अब बारिस रुक चुकी थी। सुबह का समय हो गया था। वर्षा से गीली मिट्टी में गायों के पद चिन्ह के आधार पर नरवर घाटी तक तेजाजी पहुँच गए। वहाँ के प्रत्यक्ष दर्शी लोगों ने बताया कि मीणा नरवर घाटी पार करने वाले हैं। तेजाजी की घोड़ी लीलण हवा की तरह उड़ती थी। तेजाजी ने नरवर घाटी में मीणों को जा ललकारा। यहाँ मीणों ने एक चालाकी अपनाई। शेष बचे मीणों में से आधे तेजाजी से लुका-छिपी, झपट्टामार संघर्ष करने लगे तथा आधे केरडा को लेकर चांग की तरफ निकल लिए। घाटी स्थित सारे मीणों को परास्त करने के बाद तेजाजी पद चिन्हों के आधार पर आगे बढ़े। चांग के लीलाखुर न्हालसा में केरडा हेतु लड़ाई - मीणा केरडा को चांग के पलसे तक ले भागने में सफल हो गए। चांग गाँव से करीब 1.5 किमी उत्तर की तरफ ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी मंगरे में जिस स्थान का नाम नीलाखुर न्हालसा (लीलण के खुर का नाला, वहाँ चट्टानों पर लीलण के खुरों के चिन्ह बने हुये हैं। वहाँ झरना भी फूटता है। उस जगह को वहाँ के लोग पवित्र मानते हैं। झरने में स्त्रियाँ अपने पैर तथा कपड़े नहीं धोती है) वहाँ मीणों के साथ तेजाजी की दूसरी लड़ाई होती है। मीणों का चांग गाँव निकट होने से वे भी लड़ाई में शामिल हो जाते हैं। अब मीणों की संख्या 750 हो जाती है। लीलण हवा से बातें करती है। तेजाजी का बीजल सार भाला, बिजली की गति से मीणों पर वार करता है। यहाँ भी मीणों की हार होती है। मरे सो मरे बाकी सिर पर पैर रख कर भाग जाते हैं। तेजाजी के भालों की गति तथा भलकार के कारण 750 की संख्या होने के बावजूद तेजाजी के निकट नहीं फटक पाते हैं किन्तु बाणों की बोछार करके तेजाजी को अत्यधिक घायल कर देते हैं। मीणों का मूल गाँव चांग नीला खुर न्हालसा (लीलण के खुर का नाल) द्वितीय समर भूमि चांग-चितार जिला पाली – [पृष्ठ-254]: यह चांग गाँव ब्यावर से 10 किमी पश्चिम में पहाड़ियों के बीच स्थित है। ब्यावर में चांग गेट का नाम इसी गाँव के नाम पर पड़ा है। यह गाँव 1500-2000 वर्ष पुराना है। गाँव के सरपंच कालूभाई काठात व सुवाभाई काठात, शकूर काठात व बीरदा भाई काठात के अनुसार सर्वप्रथम यहाँ चंगेला गुर्जर जाति रहती थी। इसलिए इस गाँव का नाम चांग पड़ा। आज से करीब 1300 वर्ष पहले मीणा जाति के लोगों ने गुर्जरों को यहाँ से मार भगाया और स्वयं यहाँ बस गए। आज से 700 वर्ष पहले यहाँ मेहरात आकार बस गए और मीणों को मार भगाया। सरपंच कालूभाई ने बताया कि अजमेर के फ़ाईसागर रोड स्थित अजयसर निवासी मोहनदादा भाट की पोथी में उक्त बातें लिखी हैं। मेरा जी के नाम से मेहरात जाति बनी। मेरा जी यानि मेरू (मेर, पहाड़ियाँ के निवासी) मेरा जी के काठाजी, गोड़ा जी दो लड़के थे। वैसे काठाजी व गोड़ा जी उन??